योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । २६७
ने समझाने के निमित्त नाना प्रकार के विकल्पजाल कहे हैं आत्मा में विकल्प जाल कोई नहीं । जैसे जल और उसकी तरङ्ग में; सुवर्ण और भूषण में और अवयवी और अवयव में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और शक्ति में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! एक संवित् है और एक संवेदन है; संवित् वास्तव है और संवेदन कल्पना है । जब संवित् में चिन्मात्र संवेदन फुरता है तो वह जैसे चेतता जाता है तैसे ही होकर स्थित होता है । शुद्ध चिन्मात्र संवित् में भीतर और बाहर कल्पना कोई नहीं । जब स्वभाव से किञ्चनरूप संवेदन होता है तब आगे कुछ देखता है और उसे देखने से नाना प्रकार के आकार भासते हैं पर वह और कुछ नहीं सर्व ब्रह्म ही है । हे रामजी ! शक्ति और शक्तिमान में भेद अज्ञानी देखते हैं और अवयवी और अवयव भेद भी कल्पते हैं । परमार्थ में कुछ भेद नहीं केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है उसके आश्रय संकल्प आभास होता है । जब संकल्प की तीव्रता होती है तब वह सत् हो अथवा असत्, परन्तु उसही का भान होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बीजावतारो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो सर्वगत देव, परमात्मा महेश्वर है यह स्वच्छ अनुभव, परमानन्दरूप और आदि अन्त से रहित है। उस शुद्ध चिन्मात्र परमानन्द से प्रथम जीव उपजा, उससे चित्त उपजा और चित्त से जगत् उपजा है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अनुभव परिणाम से जो शुद्ध ब्रह्मतत्त्व; सर्वव्यापी, द्वैत से रहित स्थित है उसमें तुच्छ रूप जीव कैसे सत्यता पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म सदा भास है अर्थात् असद्रूप जगत् उससे सत् भासता है और स्वच्छ है अर्थात् आभासरूपी जगत् से रहित है । बृहत् है अर्थात् बड़ा है बड़ा भी दो प्रकार का है; अविद्याकृत जगत् से जो बड़ा है सो अविद्या की बड़ाई मिथ्या है । ब्रह्म बड़ाई सर्वात्मकरूप है सो सर्वदेश, सर्वकाल और सर्ववस्तु से पूर्ण है और अविद्याकृत बड़ाई देश काल वस्तु से रहित निराकार है सो ज्ञानी का विषय है इससे बृहत् है और परम चेतन