भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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२७२ योगवाशिष्ठ ।

दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही अज्ञान से जगत्भ्रम भासता है। जैसे मद्यपान करके वृक्ष भ्रम भासते हैं तैसे ही चित्त के संयोग से भ्रम करके जगत्द्वैत भासते हैं। जैसे बालक लीला करके भ्रम से जगत् को चक्र की नाईं भ्रमता देखता है तैसे ही चित्त के भ्रम से जीव जगत् भ्रम देखता है। हे रामजी! जब चित्त द्वैत नहीं चेतता तब यह द्वैतभ्रम मिट जाता है। जब तक चित्तसत्ता फुरती है तब तक नाना प्रकार का जगत् भासता है और शान्ति नहीं पाता और जब घन चेतनता पाता है तब शान्ति पाकर जगत्भ्रम मिट जाता है जैसे पपीहा बकता है और शान्तिमान् नहीं होता पर घन वर्षा से तृप्त होकर शान्त होता है तैसे ही जब जीव महाचैतन्य घनता को प्राप्त होता है तब शान्तिमान होता है तब वह चाहे व्यवहार में हो अथवा तूष्णीम् रहे सदा शान्तिमान होता है। हे रामजी! जब चित्त की चैतन्यता फुरती है तब जगत्भ्रम से नाना प्रकार के विकार देखता है और भ्रम से ही ऐसे देखता है कि मैं उपजा हूँ, अब बड़ा हुआ हूँ और अब में मरूँगा। पर वास्तव में जीव चेतन ब्रह्म से अनन्यस्वरूप है। जैसे वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और चैतन्यता में कुछ भेद नहीं, जैसे वायु सदा रहता पर जब स्पन्दरूप होता है तब स्पर्श करता भासता है तैसे ही चैतन्यता मिटती नहीं। ब्रह्म की चेतना हो तब जगत्भ्रम मिट जाता है और केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती है। जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्पभ्रम होता है और रस्सी के यथार्थ जाने से सर्पभ्रम मिट जाता है तो रस्सी ही भासती है; तैसे ही ब्रह्म के अज्ञान से जगत्भ्रम भासता है और जब चित्त से दृढ़ चेत्यता भासती है तब भ्रम पदार्थ का ज्ञान होता है और तभी जगत्भ्रम भी मिट जाता है, केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती है। हे रामजी! दृश्यरूपी व्याधिरोग लगा है और उस रोग का नाशकर्त्ता संवित्मात्र है। जब तक चित्त बहिर्मुख होकर दृश्य को चेतता है तब तक शान्त नहीं होता और जब सर्ववासना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित अन्तर्मुख होगा तब उसही काल में मुक्तिरूप शान्त होगा—इसमें कुछ संशय नहीं। जैसे रस्सी दूर के देखने से सर्प भासती है और