योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६८ | योगवाशिष्ठ । |
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के प्रकाश से प्रकाशते हैं—जैसे—कमल और नीलोत्पल दोनों को सूर्य प्रकाशता है । कमल श्वेत है और नीलोत्पल श्याम है; जहाँ श्वेत कमल है वहाँ नीलोत्पल का अभाव है और जहाँ नील कमल है वहाँ श्वेत कमल का अभाव है पर दोनों का प्रकाशक सूर्य है; तैसे ही तम और प्रकाश दोनों का प्रकाशक चिदात्मा है । जैसे रात्रि और दिन दोनों सूर्य से सिद्ध होते हैं तैसे ही तम और प्रकाश दोनों आत्मा से सिद्ध होते हैं । जैसे दिन तब कहाता है, जब सूर्य उदय होता है और जब सूर्य अस्त होता है तब रात्रि होती है; आत्मा तैसे भी नहीं । आत्मप्रकाश सदा उदयरूप है और उदय अस्त से रहित भी है । उस बिना कुछ सिद्ध नहीं होता सबका प्रकाश चिद्अणु ही है । हे राक्षसी ! उस अणु के भीतर विचित्र अनुभव अणु है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फूल, फल और टास होते हैं तैसे ही चिद्अणु में सब अनुभव अणु होते हैं । जैसे एक बीज से अनेक वृक्ष क्रम से हो जाते हैं तैसे ही एक चिद्अणु से अनेक अनुभव अणु होते हैं। कई व्यतीत हुए हैं; कई वर्त्तमान हैं और कई होंगे । जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं सो कोई अब वर्त्तते हैं और कई आगे होंगे; तैसे ही आत्मा में तीनों काल की सृष्टि वर्त्तती है । हे राक्षसी ! चिद्अणु आत्मा उदासीन है और आसीन की नाईं स्थित होता है । सबका कर्त्ता भी है और भोक्ता भी है और स्पर्श किसी से नहीं किया जाता । जगत् की सत्यता उसी से उदय होती है इस कारण वह सबका कर्त्ता है और सबका अपना आप है इससे सबको भोगता है । वास्तव में न कुछ उपजा है और न लीन होता है । चिन्मात्रसत्ता ज्यों की त्यों सदा अपने आपमें स्थित है और अखण्ड और सूक्ष्म है इस कारण किसी से स्पर्श नहीं किया जाता है । हे राक्षसी ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब आत्मरूप है; आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । आत्मा और जगत् कहनेमात्र को दोनों नाम हैं वास्तव में एक आत्मा ही है । आत्मा का चमत्कार ही जगत्रूप हो भासता है । वास्तव में जगत् कुछ बना नहीं चिन्मात्रसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और जो कुछ कहना है वह उपदेश के निमित्त है वास्तव में दूसरी कुछ वस्तु नहीं