भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 1734 में से

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३०० योगवाशिष्ठ ।

केवल शुद्ध संवित्मात्र पद शेष रहता जिसमें वाणी की गम नहीं। जैसे दीपक पदार्थों को प्रकाशता है तैसे ही द्रष्टा दर्शन और दृश्य को प्रकाशता है और बोध से मातृ, मान और मेय त्रिपुटी लीन हो जाती है। जैसे सुवर्ण के जानने से भूषण की कल्पना का अभाव हो जाता है तैसे ही ज्ञान से त्रिपुटी का अभाव हो जाता है केवल शुद्ध अद्वैतरूप रहता है। हे राक्षसी ! परमाणु जो अत्यन्त निस्स्वादरूप है वह सर्व स्वादों को उपजाता है। जहाँ रस सहित होता है वह चिद्अणु करके होता है जैसे आदर्श बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता तैसे ही सब स्वाद चिद्अणु बिना नहीं होते। सबको रस देनेवाला चिद्अणु ही है। आत्मभाव से सबका अधिष्ठान है और सूक्ष्म से सूक्ष्म है इससे निस्स्वाद है। वह चिद्अणु आपको छिपा नहीं सकता। सब जगत् को उसने ढाँप रखा है और आप किसी से ढाँपा नहीं जाता। वह चिदाकाशरूप है; सब पदार्थों को सत्ता देनेवाला है और सबका आश्रयभूत है। जैसे घास के बन में हाथी नहीं छिपता तैसे ही आत्मा किसी पदार्थ से नहीं छिपता। हे राक्षसी ! जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं और जो सदा प्रकाशरूप है वह मूर्खों को नहीं भासता-यह बड़ा आश्चर्य है। वह सदा अनुभवरूप है और यह सब जगत् उस ही से जीता है। जैसे वसन्त ऋतु से फूल, फल, टास और पत्र फूलते हैं तैसे ही सब जगत् आत्मा से फूलता है। वही चिदात्मा जगतरूप होके भासता है और सर्वात्मभाव से सब उसके ही अवयव हैं। परमार्थ निरवयव और निराकाररूप है उसमें कुछ उदय नहीं हुआ। हे राक्षसी ! एक निमेष के अबोध से चिद्अणु में अनेक कल्पों का अनुभव होता है। जैसे एक क्षण के स्वप्न में पहले आपको बालक और फिर वृद्धअवस्था देखने लगता है। उन कल्पों में जो निमेष है उसमें अनेक कल्प व्यतीत होते हैं क्योंकि अधिष्ठान सर्व शक्तिमान् है जैसा संवेदन जहाँ फुरता है वैसा रूप हो भासता है जैसे स्वप्न में अभोक्ता को भोक्तृत्व का अनुभव होता है। तैसे ही निमेष में कल्प का अनुभव होता है। वासना से आवेष्टित अभोक्ता ही आपको भोक्ता देखता है जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना मरण प्रत्यक्ष देखता है तैसे ही

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