योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३१६
नहीं जानते ? तब अहल्या ने कहा मुझको सब इन्द्र ही भासता है; भिन्न दुःख क्या हो ? इन्द्र ने कहा मुझको सब अहल्या ही भासती है; भिन्न दुःख कहाँ हो ? तेरे दण्ड देने से हमको कुछ दुःख नहीं होता हम परस्पर हर्षवान् हैं। तब राजा ने उनको बाँधकर अग्नि में डाल दिया तो भी वह न जले और फिर हाथी के चरणोंतले डलवा दिये गये तो भी उनको कुछ कष्ट न हुआ । तब राजा ने कहा, रे पापियों ! तुमको अग्नि आदिक में दुःख क्यों नहीं होता ? तब इन्द्र ने कहा, हे राजन् ! जो कुछ जग-ज्जाल है वह मन में स्थित है। जैसा मन है तैसा पुरुषरूप है। जैसा निश्चय मन में दृढ़ होता है उसको कोई दूर नहीं कर सकता । चाहे कोई हमको दण्ड दे परन्तु हमको कुछ दुःख न होगा, क्योंकि हमारे हृदय में परस्पर प्रतिभा हो रही है। जो कोई अनिष्ट हमको हो तो दुःख भी हो; हमको अनिष्ट तो कोई नहीं तब दुःख कैसे हो ? हे राजन् ! जो कुछ मन में दृढ़ीभूत होता है वही भासता है उसका निश्चय कोई दूर नहीं कर सकता । शरीर नष्ट हो जाता है परन्तु मन का निश्चय नष्ट नहीं होता । हे राजन् ! जो मन में तीव्र संवेग होता है सो वर और शाप से भी दूर नहीं होता । जैसे सुमेरु पर्वत को मन्द-मन्द वायु नहीं चला सकता तैसे ही मन के निश्चय को कोई नहीं चला सकता । मेरे हृदय में इसकी मूर्ति स्थिरीभूत है और इसके हृदय में मेरी मूर्ति स्थिरी-भूत है । इसको सब जगत् में ही भासता हूँ और मुझको सब जगत् यही भासती है। जो कुछ दूसरा भासे तो दुःख भी हो । जैसे लोहे के कोट में कोई दुःख नहीं दे सकता तैसे ही मुझको कोई दुःख नहीं, मैं जहाँ जाता हूँ वहाँ सब ओर से अहल्या ही भासती है । जैसे ज्येष्ठ आषाढ़ की वर्षा में पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही हमको दुःख नहीं । हे राजन् ! मन का ही नाम अहल्या और इन्द्र है और मन ही ने सब जगत् रचा है। जैसा-जैसा मन में दृढ़ निश्चय होता है तैसा ही भासता है और सुमेरु की नाईं स्थिर हो जाता है, कदापि नष्ट नहीं होता । जैसे पत्र, फल, फूल, और टहनी के काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता; जब बीज ही नष्ट हो तब वृक्ष नष्ट होता है तैसे ही शरीर के नष्ट होने से मन का