भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

उत्पत्ति प्रकरण । ३२३

यह सब मन में फुरता है । मन के दो रूप हैं—एक जड़ और दूसरा चेतन । जड़रूप मन का दृश्यरूप है और चेतनरूप ब्रह्मा है । जब दृश्य की ओर फुरता है तब दृश्यरूप होता है और जब चेतनभाव की ओर स्थित होता है तब जैसे सुवर्ण के जाने से भूषणभाव नष्ट हो जाता है तैसे ही दृश्यरूप जड़ भाव नष्ट हो जाता है । जब जड़ भाव में फुरता है तब नाना प्रकार के जगत् देखता है । वास्तव में ब्रह्मादिक तृणपर्यन्त सब ही चैतन्यरूप हैं । जड़ उसको कहना चाहिये जिसमें चित्त का अभाव हो । जैसे लकड़ी में चित्त नहीं भासता और प्राणधारियों में चित्त भासता है । परन्तु स्वरूप में दोनों तुल्य हैं, क्योंकि सर्व परमात्मा द्वारा प्रकाशते हैं । हे वशिष्ठजी ! सब चेतनस्वरूप हैं, जो चेतनस्वरूप न हों तो क्यों भासैं । चेतनता से उपलब्धरूप होते है । जड़ और चेतन का विभाग अवाच्य ब्रह्म में नहीं पाया जाता; प्रमाद दोष से है वास्तव में नहीं । जैसे स्वप्न में जो दो प्रकार के जड़ और चेतन भूत भासते हैं उनका प्रमाद होता है तब उस चेतन भूत प्राणी को जड़ चेतन विभाग भासता है और स्वरूपदर्शी को सब एक स्वरूप है । हे मुनीश्वर ! ब्रह्मा में जो चेत्यता हुई वही मन हुआ उस मन में जो चेतनभाग है वही ब्रह्मा है और जड़भाग अबोध है । जब अबोधभाव होता है तब दृश्यभ्रम देखता है और जब चेतनभाव में स्थित हो जाता है तब शुद्ध रूप होता है । हे मुनीश्वर ! चेतनमात्र में अहंकार का उत्थान दृश्य है और परमार्थ में कुछ भेद नहीं । जैसे तरङ्ग जल से भिन्न नहीं तैसे ही अहं चेतनमात्र से भिन्न नहीं होता । सबकी प्रतीति ब्रह्म ही में होती है, वह परमपद है और सब दुःखों से रहित है । वही शुद्ध चित्त जीव जब चेत्यभाव को चेतता है तब जड़भाव को देखता है । जैसे स्वप्न में कोई अपना मरना देखता है तैसे ही वह चित्त जड़भाव को देखता है । आत्मा सर्वशक्तिमान् है; कर्त्ता है तो भी कुछ नहीं करता और उसके समान और कोई नहीं । हे मुनीश्वर ! यह जगत् कुछ वास्तव में उपजा नहीं, चित्त के फुरने से भासता है । जब चित्त की स्फूर्ति होती है तब जगज्जाल भासता है और जब चेतन आत्मा में स्थित होता है तब मन