भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 327

३३२ योगवाशिष्ठ ।

हुए उष्णता भी नष्ट होती है और जब उष्णता नष्ट होती है तब अग्नि भी नष्ट होता है तैसे ही मन के नष्ट हुए कर्म भी नष्ट होते हैं और कर्म का नाश होने से मन भी नष्ट होता है । एक के अभाव से दोनों का अभाव होता है । कर्मरूपी चित्त है और चित्तरूपी कर्म है इससे परस्पर अभेदरूप है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे कर्मपौरुषयोरैक्य प्रतिपादन न्नामैकसप्ततितमसर्गः ॥ ७१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मन भावनामात्र है । भावना फुरने का नाम है और फुरना क्रियारूप है । उस फुरना क्रिया से सर्वफल की प्राप्ति होती है । रामजी बोले, हे ब्राह्मण ! इस मन का रूप जो जड़-अजड़ है वह विस्तारपूर्वक कहिए । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मतत्त्व अनन्त-रूप और सर्वशक्तिमान् है । जब उनमें संकल्पशक्ति फुरती है तब उसको मन कहते हैं, जड़ अजड़ के मध्य में जो दोलायमान होता है उस मिश्रित-रूप का नाम मन है । हे रामजी ! भावरूप जो पदार्थ उनके मध्य में जो सत्य असत्य का निश्चय करता है उसका नाम मन है । उसमें जो यह निश्चय देह में मिलकर फुरता है कि मैं चिदानन्दरूप नहीं, कृपण हूँ सो मन का रूप है । कल्पना से रहित मन नहीं होता जैसे गुणों बिना गुणी नहीं रहता तैसे ही कर्म कल्पना बिना मन नहीं रहता । जैसे उष्णता की सत्ता अग्नि से भिन्न नहीं होती तैसे ही कर्मों की सत्ता मन से भिन्न नहीं होती और मन और आत्मा में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! मनरूपी बीज से संकल्परूपी नाना प्रकार के फूल होते हैं; उसमें नाना प्रकार के शरीरों से संपूर्ण जगत् देखता है और जैसी जैसी मन में वासना होती है उसके अनुसार फल की प्राप्ति होती है । इससे मन का फुरना ही कर्मों का बीज है और उससे जो भिन्न क्रिया होती है सो उस वृक्ष की शाखा और नाना प्रकार के विचित्र फल हैं । हे रामजी ! जिस ओर मनका निश्चय होता है उसी ओर कर्म इन्द्रियाँ भी प्रवर्तित होती हैं और जो कर्म है वही मनका फुरना है और मन ही स्फूर्तिरूप है । इसी कारण कहा है कि मन ही कर्मरूप है उस मन की इतनी संज्ञा कही हैं मन, बुद्धि, अहङ्कार, कर्म, कल्पना, स्मृति, वासना, अविद्या, प्रकृति, माया इत्यादिक । कल्पना ही संसार के कारण है, चित्तको