भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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३४ | योगवाशिष्ठ ।

ही तृष्णा मुझे खा रही है। आत्मा के ज्ञान बिना में मृतक समान हूँ। जैसे बालक अपनी परछाहीं को बेताल मानकर भय पाता है और जब विचार करने में समर्थ होता है तब वेताल का भय नहीं होता वैसे ही चित्तरूपी वेताल ने मेरा स्पर्श किया है उससे में भय पाता हूँ। इसमें आप वही उपाय कहिये जिससे चित्तरूपी वेताल नष्ट हो जावे हे मुनीश्वर ! अज्ञान में मिथ्या वेताल चित्त में दृढ़ हो रहा है उसके नाश करने को मैं समर्थ नहीं हो सकता। अग्नि में बैठना, बड़े पर्वत के ऊपर जाना और वज्र का चूर्ण करना मैं सुगम मानता हूँ परन्तु चित का जीतना महाकठिन है। चित्त सदा ही चलायमान स्वभाववाला है। जैसे थम्भ से बाँधा हुआ वानर कभी स्थिर हो नहीं बैठता वैसे ही चित्त वासना के मारे कभी स्थिर नहीं होता। हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र का पान कर जाना, अग्नि का भक्षण करना और सुमेरु का उल्लंघन करना सुगम है, परन्तु चित्त का जीतना महाकठिन है जो सदा चलरूप है जैसे समुद्र अपना द्रवी स्वभाव कदाचित् नहीं त्यागता, महाद्रवीभूत रहता है और उसमें नाना प्रकार के तरंग उठते हैं वैसे ही चित्त भी चञ्चल स्वभाव को कभी नहीं त्यागता और नाना प्रकार की वासना उपजती रहती है। चित्त बालक की नाईं चञ्चल है, सदा विषय की ओर धावता है; कहीं-कहीं पदार्थ की प्राप्ति होती परन्तु भीतर सदा चञ्चल रहता है। जैसे सूर्य के उदय होने से दिन होता है और अस्त होने में दिन का नाश होता है, वैसे ही चित्त के उदय होने से त्रिलोकी की उत्पत्ति है और चित्त के लीन होने से जगत् भी लीन हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी समुद्र है, वासनारूपी जल है, उसमें छलरूपी सर्प जब जीव उसके निकट जाता है तब भोगरूपी सर्प उसको काटता है और तृष्णारूपी विष स्पर्श करता है उससे मरता है। हे मुनीश्वर ! भोग को सुखरूप जानकर चित्त दौड़ता है पर वह भोग दुःख का कारण है। जैसे तृण में आच्छादित खाई को देखकर मूर्ख मृग खाने दौड़ता है तो खाई में गिरकर दुःख पाता है वैसे ही चित्तरूपी मृग भोग को सुखरूप जानकर भोगने लगता है तब तृष्णा रूपी खाई में गिर पड़ता है और जन्म जन्मान्तर में दुःख भोगता रहता