भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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३४२ | योगवाशिष्ठ ।

और कष्ट पाता है और जैसे कुसवरी कीटआप ही अपने बैठने की गुफा बनाके फँस मरती है तैसे ही मनुष्य अपनी वासना से आप ही बन्धन में पड़ता है । जैसे मर्कट लकड़ी में हाथ डालके कील को निकालने लगता है और लीला करता है तो उसका हाथ फँस जाता है और कष्ट पाता है तैसे ही अज्ञानी को अपनी चेष्टा ही बन्धन करती है क्योंकि विचार बिना करता है । इससे हे रामजी ! तुम चित्त से शास्त्र और सन्तों के गणों में चिर पर्यन्त चलो और जो कुछ अर्थशास्त्र में प्रतिपाद्य है उसकी दृढ़ भावना करो । जब अभ्यास से तुम्हारा चित्त स्वस्थ होगा तब तुमको कोई शोक न होगा । हे रामजी ! जब चित्त आत्मपद में स्थित होगा तब राग और द्वेष से चलायमान न होगा और जो कुछ देहादिकों से प्रच्छन्न अहंकार है सो नष्ट होगा । जैसे सूर्य के उदय होने से वरफ गल जाती है तैसे ही तुच्छ अहंकार नष्ट हो जावेगा और सर्व आत्मा ही भासेगा । हे रामजी ! जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक शास्त्रों के अनुसार आनन्दित आचार में विचरे, शास्त्रों के अर्थ में अभ्यास करे और मन को रागद्वेषादिक से मौन करे तब पाने योग्य, अजन्मा, शुद्ध और शान्तरूप पद को प्राप्त होता है और सब शोकों से तरके शान्तरूप होता है । हे रामजी ! जब आत्मतत्त्व का प्रमाद है तब तक अनेक दुःख प्रवृद्ध होते जाते हैं शान्ति नहीं होती और जब आत्मपद की प्राप्ति होती है तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चित्तोपाख्यानसमाप्तिवर्णनंनाम पञ्चसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह चित्त परब्रह्म से उपजा है सो आत्मरूप है और आत्मरूप भी नहीं । जैसे समुद्र से तरङ्ग तन्मय और भिन्न होते तैसे ही चित्त है । जो ज्ञानवान् हैं उनको चित्त ब्रह्मरूप ही है कुछ भिन्न नहीं । जैसे जिसको जल का ज्ञान है उसको तरङ्ग भी जलरूप भासते हैं और जो ज्ञान से रहित हैं उनको मन संसारभ्रम का कारण है । जैसे जिसको जल का ज्ञान नहीं उसको भिन्न-भिन्न तरङ्ग भासते हैं तैसे ही अज्ञानी को भिन्न-भिन्न जगत् भासता है और ज्ञानवान् को केवल ब्रह्मसत्ता ही भासती