योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३४६ | योगवाशिष्ठ । |
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उनके निकट गये जो तरङ्गों से लीलायमान थीं । उनमें से दो में तो कुछ भी जल न था और तीसरी सूखी पड़ी थी । उनमें वे चिरकाल पर्यन्त क्रीड़ा करते रहे-जैसे स्वर्ग की गंगा में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कल्लोल करते हैं और जलपान किया । फिर जब दिन अस्त होने लगा तब वहाँ से चले तो एक भविष्यत् नगर देखा जो बड़ी ध्वजाओं से सम्पन्न और रत्न मणि और सुवर्ण से जड़ा मानों सुमेरु का शिखर था । उसमें उन्होंने हीरे और माणिकों से जड़ा हुआ एक मन्दिर देखा जो निराकाररूप था उसमें वे घुस गये तो वहाँ बहुत अंगना देखीं और फिर विचार किया कि रसोई कीजिये और ब्राह्मण को भोजन खवाइये । तब उन्होंने कञ्चन की तीन बटलोइयाँ मँगवाईं जिनमें से दो का करने-वाला तो उपजा नहीं अर्थात् आधार से रहित थीं और तीसरी चूर्णरूप थी । उस चूर्णरूप बटलोई में उन्होंने सोलह सेर रसोई चढ़ाई और ब्रह्मा आदि विदेहरूप और निर्मुख ऋषियों ने भोजन किया । उससे उन्होंने सैंकड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराय आप भी भोजन किया । इस प्रकार वह राजपुत्र आजतक सुख से स्थित हैं । हे पुत्र ! यह रमणीय कथा मैंने तुझसे सुनाई है । यदि तू इसको हृदय में धारेगा तो पंडित होगा । हे रामजी ! इस प्रकार धात्री ने जब बालक को कथा सुनाई तब बालक के मन में सच प्रतीत हुई । जैसे उस कथा का रूप संकल्प से भिन्न कुछ न था तैसे यह जगत् सब संकल्पमात्र है, अज्ञान से हृदय में स्थिर हो रहा है, भ्रम में इससे आस्था हुई है और बन्ध, मोक्ष भी कल्पना-मात्र है संकल्प से भिन्न इसका स्वरूप नहीं । हे रामजी ! शुद्ध आत्मा निष्किञ्चनरूप है पर संकल्प के वश से किञ्चनरूप हो भासता है । पृथ्वी, वायु, आकाश, नदियाँ, देश आदिक जो पाञ्चभौतिक सृष्टि है सो सब संकल्पमात्र है जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि भासती है और कुछ नहीं उपजी तैसे ही इस जगत् को जानो । जैसे कल्पित राजपुत्र भविष्यत् नगर में स्थित हुए थे और वह रचना संकल्प बालक को स्थिरीभूत हुई थी तैसे ही यह जगत् संकल्पमात्र मन के फुरने से दृढ़ हुआ है । जैसे द्रवता से जो जल में तरङ्ग होते हैं वह जल ही जल है तैसे ही आत्मा