भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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३६६ | योगवाशिष्ठ ।

रामजी ! जिन पुरुषों को अपनी इच्छा त्यागनी कठिन है वे विषयों के कीट हैं, क्योंकि अशुभ पदार्थ मूढ़ता से रमणीय भासते हैं उस अशुभ को अशुभ और शुभ को शुभ जानना यही पुरुषार्थ है। हे रामजी ! शुभ अशुभ दोनों पहलवान हैं, उन दोनों में जो बली होता है उसकी जय होती है। इससे शीघ्र ही पुरुष प्रयत्न करके अपने चित्त को जीतो। जब तुम अचित्त होगे तब यत्न बिना आत्मपद को प्राप्त होगे। जैसे बादलों के अभाव हुए यत्न बिना सूर्य भासता है तैसे ही आत्मपद के आगे चित्त का फुरना जो बादलवत् आवरण है उसका जब अभाव होगा तब अक्षयसिद्ध आत्मपद भासेगा जो चित्त के स्थित करने का मन्त्र भी आप से होता है। जिसको अपने चित्त वश करने की भी शक्ति नहीं उसको धिक्कार है वह मनुष्यों में गर्दभ है। अपने पुरुषार्थ से मन का वश करना अपने साथ परम मित्रता करनी है और अपने मन के वश किये बिना अपना आप ही शत्रु है अर्थात् मन के उपशम किये बिना घटीयन्त्र की नाईं संसारचक्र में भटकता है जिन मनुष्यों ने मन को उपशम किया है उनको परम लाभ हुआ है। हे रामजी ! मन के मारने का मन्त्र यही है कि दृश्य की ओर से चित्त को निवृत्त करे और आत्मचेतन संवित् में लगावे, आत्मचिन्तना करके चित्त को मारना सुखरूप है। हे रामजी ! इच्छा से मन पुष्ट रहता है। जब भीतर से इच्छा निवृत्त होती है तब मन उपशम होता है और जब मन उपशम होता है तब गुरु और शास्त्रों के उपदेश और मन्त्र आदिकों की अपेक्षा नहीं रहती । हे रामजी ! जब पुरुष असंकल्परूपी औषध करके चित्त-रूपी रोग काटे तब उस पद को प्राप्त हो जो सर्व और सर्वगत शान्त-रूप है। इस देह को निश्चय करके मूढ़ मन ने कल्पा है। इससे पुरु-षार्थ करके चित्त को अचित्त करो तब इस बन्धन से छुटोगे। हे रामजी ! शुद्ध चित्त आकाश में यत्न करके चित्त को लगाओ। जब चिरकाल पर्यन्त मन का तीव्र संवेग आत्मा की ओर होगा तब चेतन चित्त का भक्षण कर लेगा और जब चित्त का चिन्तत्व निवृत्त हो जावेगा तब केवल चेतनमात्र ही शेष रहेगा। हे रामजी ! जब जगत् की भावना से