योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३६६
वह मन संकल्प से रहित नष्ट हो जाता है और संकल्प के बढ़ने से अनर्थ का कारण होता है । इससे संकल्प से रहित उस चक्रवर्ती राजा-पद में आरूढ़ हुआ परमपद को प्राप्त होगा जिस पद में स्थित होने से चक्रवर्ती राज तृणवत् भासता है । हे रामजी ! मन के क्षीण होने से जीव उत्तम परमानन्द पद को प्राप्त होता है । हे रामजी ! सन्तोष से जब मन वश होता है तब नित्य, उदयरूप, निरीह, परमपावन, निर्मल, सम, अनन्त और सर्वविकार विकल्प से रहित जो आत्मपद शेष रहता है वह तुमको प्राप्त होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे मनशक्तिरूपप्रतिपादननाम षडशीतितमसर्गः ॥ ८६ ॥
वशिष्टजी बोले, हे रामजी ! जिसके मन में तीव्रसंवेग होता है उसका मन देखता है । अज्ञान से जो दृश्य का तीव्र संवेग हुआ है उससे चित्त जन्म-मरणादिक विकार देखता है और जैसा निश्चय मन में दृढ़ होता है उसी का अनुभव करता है, जैसा मन का फुरना फुरता है तैसा ही रूप हो जाता है । जैसे बरफ का शीतल और शुक्ल रूप है और काजल का कृष्ण रूप है, तैसे ही मन का चञ्चल रूप है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! यह मन जो वेग अवेग का कारण चञ्चल रूप है उस मन की चपलता कैसे निवृत्त हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तुम सत्य कहते हो, चञ्चलता से रहित मन नहीं दीखता; क्योंकि मन का चञ्चल स्वभाव ही है । हे रामजी ! मन में जो चञ्चलता फुरना मानसी शक्ति है वही जगत्आडम्बर का कारणरूप है । जैसे वायु का स्पन्द रूप है तैसे ही मन का चञ्चल रूप है जिसका मन चञ्चलता से रहित है उसको मृतक कहते हैं । हे रामजी ! तप और शास्त्र का जो सिद्धान्त है वह यही है कि मन के मृतकरूप को मोक्ष कहते हैं, उसके क्षीण हुए सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । जब चित्तरूपी राक्षस उठता है तब बड़े दुःख को प्राप्त होता है और चित्त के लय होने से अनन्त सुखभोग प्राप्त होते हैं अर्थात् परमानन्दस्वरूप आत्मपद प्राप्त होता है । हे रामजी ! मन में चञ्चलता अविचार से सिद्ध है और विचार से नष्ट हो जाती है । चित्त की चञ्चलतारूप