योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 369, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ | योगवाशिष्ठ ।
की नदी को देख के मूर्ख मृग जल पान के निमित्त दौड़ते हैं और कष्ट- वान् होते हैं तैसे ही जगत् के पदार्थों को देखकर अज्ञानी दौड़के यत्न करते हैं और ज्ञानवान् तृष्णा के लिये यत्न नहीं करते । ज्यों ज्यों मूर्ख मृग दौड़ते हैं त्यों त्यों कष्ट पाते हैं, शान्ति नहीं पाते, तैसे ही अज्ञानी जगत् के भोगों की तृष्णा करते हैं परन्तु शान्ति नहीं पाते । जैसे तरङ्ग और बुद्बुदे सुन्दर भासते हैं परन्तु ग्रहण किये से कुछ नहीं निकलते तैसे ही शान्ति का कारण जगत् में सार पदार्थ कोई नहीं निकलता । जडरूप अविद्या जगदाकार हुई है, वह चेतन से अभिन्नरूप है परन्तु भिन्न की नांई स्थित हुई है । जैसे मकड़ी अपनी तन्तु फैलाकर फिर अपने में लीन कर लेती है, वह उससे अभिन्नरूप है परन्तु भिन्न की नांई भासती है और जैसे अग्नि से धूम निकलकर बादल का आकार हो रस खींचता है और मेघ होकर वर्षा करता है तैसे ही अविद्या आत्मा में उपजकर और आत्मा की सत्ता पाकर जगत् रचती है, उस जगत् में यह जीव घटीयन्त्र की नांई भटकता है । जैसे रस्सी में बँधी हुई घड़ियाँ ऊपर नीचे भटकती हैं तैसे ही तीनों गुणों की वासना से बँधा हुआ जीव भटकता है । जैसे कीचड़ में कमल की जड़ उपजती है और उसके भीतर छिद्र होते हैं तैसे ही अविद्यारूपी कीचड़ से यह जगत् उपजा है और विकाररूपी दृश्य इसमें छिपे हैं-सारभूत इसमें कुछ नहीं । जैसे अग्नि घृत और ईंधन के संयोग से बढ़ती जाती है तैसे ही अविद्या विषयों की तृष्णा में बढ़ती जाती है, जैसे घृत और ईंधन से रहित अग्नि शान्त हो जाती है तैसे ही तृष्णा से रहित अविद्या शान्त हो जाती है । जब विवेकरूपी जल पड़े और तृष्णारूपी घृत न पड़े तब अग्निरूपी अविद्या नष्ट हो जाती है अन्यथा नहीं नष्ट होती । हे रामजी ! यह अविद्या दीपक शिखा के तुल्य है और तृष्णारूपी तेल से अधिक प्रकाशवान् होती है । जब तृष्णा रूपी तेल में रहित हो और विवेकरूपी वायु चले तब दीपक शिखा- वत अविद्या निर्वाण हो जावेगी और न जानियेगा कि कहाँ गई । अविद्या कुहिरे की नांई आवरण करती भासती है परन्तु ग्रहण करिये तो कुछ हाथ नहीं आती । देखनेमात्र स्पष्ट दृष्टि आती है, परन्तु विचार