योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति प्रकरण । ३८१
असत्य अविद्या है उसको बारम्बार स्मरण करता है ऐसी अविद्या को तुम मत प्राप्त हो । हे रामजी ! मन का मनन ही अविद्या है और अनर्थ का कारण है, इससे जीव अनेक भ्रम देखता है । मन के फुरने से अमृत से पूर्ण चन्द्रमा का बिम्ब भी नरक की अग्नि समान भासता है और बड़ी लहरों तरंगों और कमलों से संयुक्त जल भी मरुस्थल की नदी समान भासता है । जैसे स्वप्न में मन के फुरने से नाना प्रकार के सुख और दुःख का अनुभव होता है वैसे ही यह सब जगद्भ्रम चित्त की वासना से भासता है । जाग्रत और स्वप्न में यह जीव मन के फुरने से विचित्र रचना देखता है । जैसे स्वर्ग में बैठे हुए को भी स्वप्न में नरकों का अनुभव होता है वैसे ही आनन्दरूप आत्मा में प्रमाद से दुःख का अनुभव होता है । हे रामजी ! अज्ञानी मन के फुरने से शून्य अणु में भी सम्पूर्ण जगत् भ्रम दीखता है जैसे राजा लवण को सिंहासन पर बैठे चाण्डाल की अवस्था का अनुभव हुआ था । इससे संसार की वासना को तुम चित्त से त्याग दो । यह संसार वासना बन्धन का कारण है । सब भावों में बतों परन्तु राग किसी में न हो । जैसे स्फटिक मणि सब प्रतिबिम्बों को लेता है परन्तु रङ्ग किसी का नहीं लेता तैसे ही तुम सब कार्य करो परन्तु द्वेष किसी में न रखो । ऐसा पुरुष निर्बन्धन है उसको शास्त्र के उपदेश की आवश्यकता नहीं, वह तो निजरूप है । हे रामजी ! जो कुछ प्रकृत आचार तुमको प्राप्त हो तो देना, लेना, बोलना, चलना आदिक सब कार्य करो परन्तु भीतर से अभिमान कुछ न करो, निर्गभिमान होकर कार्य करो-यह ज्ञान सबसे श्रेष्ठ है ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे यथाकथितदोषपरिहारोपदेशो- नाम नवाशीतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब महात्मा वशिष्ठजी ने कहा तब कमलनयन रामजी ने वशिष्ठजी की ओर देखा और उनका अन्तःकरण रात्रि के मूँदे हुए कमल की नाईं प्रफुल्लित हो आया । तब रामजी बोले कि बड़ा आश्चर्य है । पद्म की ताँत के साथ पर्वत बाँधा है । अविद्यमान अविद्या ने सम्पूर्ण जगत् वश किया है और अविद्यमान जगत्