भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 389

३६४ योगवाशिष्ठ ।

की ओर देखिये तब सब भूषण स्वर्णरूप भासते हैं तैसे ही जब ब्रह्मसत्ता की ओर देखिये तब सब जगत् ब्रह्मरूप ही भासता है । जैसे मृत्तिका की सेना बालकों को अनेकरूप भासती है और बुद्धिमान् को एक मृत्तिका रूप है तैसे ही अज्ञानी को यह जगतरूप नानारूप भासता है, ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही भासती है । वह कौन ब्रह्म है जिसमें द्रष्टा, दर्शन, दृश्य फुरे हैं ? इनके मध्य ओर इनसे रहित जो सत्ता है वह ब्रह्मसत्ता है । हे रामचन्द्र ! जो सत्ता चैतन्यरूप और शिला के कोशवत् निर्विकल्प तन्मय रूप है उसमें जब स्थित हो और समाधि में रहो अथवा उत्थान हो तब तुमको सब वही रूप भासेगा । हे रामचन्द्र ! जो पुरुष निर्मल सत्ता में स्थित भया है वह शरीर के इष्ट में हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट में शोकवान् नहीं होता, वह निर्मल रूप होकर स्थित होता है । जैसे भविष्यत् नगर में जो अनेक चिन्तायुक्त जीव बसते हैं वह सब उसके चित्त में स्थित होते हैं । जैसे पुरुष को देशान्तर जाते अनेक पदार्थ मार्ग में इष्ट अनिष्टरूप भासते हैं परन्तु जहाँ जाना है उसकी ओर वृत्ति रहती है, मार्ग के पदार्थों में उसको राग-द्वेष नहीं होता, तैसे ही तुम हो जाओ । जैसे पत्थर से जल और जल से अग्नि नहीं निकलती, तैसे ही आत्मा में चित्त नहीं, अविचार भ्रम से चित्त जानता है, विचार से नहीं पाता । जैसे भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही आत्मा में चित्त भासता है, वास्तव में कुछ नहीं । वह सत्ता नित्य, शुद्ध, परमानन्दरूप अपने आपमें स्थित है और अनुभवरूप है, उसके विस्मरण करने से दुःख प्राप्त होता है जैसे अमृतरूपी चन्द्रमा में अग्नि प्राप्त होती है । इससे हे रामचन्द्र ! तुम सावधान हो । यह जो फुरना उठता है इसी का नाम चित्त है और चित्त कोई नहीं । इस चित्त को दूर से त्याग करो जो तुम हो वही स्थित हो । हे रामचन्द्र ! असतरूप चित्त ही संसार है, जो उसको असत्य जानके त्याग नहीं करता वह आकाश के वन में विचरता है, उसको धिक्कार है। जिसका मनन भाव नष्ट हुआ है वह महापुरुष संसार से पार होकर परमपद निश्चितरूप में प्राप्त हुआ है । इति श्रीयो० उत्पत्ति० चित्ताभावप्रतिपादनन्नामपञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६॥