भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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४०२ योगवाशिष्ठ ।

पर आत्मा तो अद्वैत है, उसके निकट दूसरी वस्तु नहीं है, वह कर्त्ता कैसे हो और किसका हो, सहकारी भी नहीं जिससे कार्य करे, वह तो मन और इन्द्रियों से रहित निराकार अविकृतरूप है और समवाय कारण भी परिणाम से होता है। जैसे वट बीज परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा तो अच्युतरूप है, परिणाम को कदाचित् नहीं प्राप्त होता तो समवाय कारण कैसे हो ? जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, क्षीयते, नश्यति, इन षट् विकारों से रहित निर्विकार आत्मा जगत् का कारण कैसे हो ? इससे यह जगत् अकारणरूप भ्रान्ति से भासता है। जैसे आकाश में नीलत्ता, सीप में रूपा निद्रादोष से स्वप्न दृष्टि भासते हैं तैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से भासता है और जब स्वरूप में जागे तब जगद्भ्रम मिट जाता है। इससे कारणकार्य भ्रम को त्यागकर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो। दुर्बोध से संकल्प रचना हुई है उसको त्याग करो और आदि, मध्य और अन्त से रहित जो सत्ता है उसी में स्थित हो तब जगद्भ्रम मिट जावेगा। इति श्रीयोगवाशिष्ठे स्थितिप्रकरणे जगत् निराकरणन्नाम प्रथमसर्गः ॥ १ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे देवताओं में श्रेष्ठ, रामजी ! बीज से अंकुरवत् आत्मा से जगत् का होना अङ्गीकार कीजिये तो भी नहीं बनता, क्योंकि आत्मा सर्वकल्पनाओं से रहित महाचैतन्य और निर्मल आकाशवत् है, उसको जगत् का बीज कैसे मानिये ? बीज के परिणाम में अंकुर होता है, और कारण समवायियों से होता है, आत्मा में समवाय और निमित्त सहकारी कदाचित् नहीं बनते। जैसे बन्ध्या स्त्री की सन्तान किसी ने नहीं देखी तैसे ही आत्मा से जगत् नहीं होता। जो समवाय और निमित्तकारण बिना पदार्थ भासे तो जानिये कि यह है नहीं, भ्रान्तिमात्र भासता है। आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और सृष्टि स्थित, प्रलय से ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है। जो इस प्रकार स्थिति है तो कारण कार्य का क्रम कैसे हो और जो कारण कार्य भाव न हुआ तो पृथ्वी आदिक भूत कहाँ से उपजे ? और जो कारण कार्य मानिये तो पूर्व जो विकार कहे हैं उनका दूषण आता है। इससे न कोई कारण है और न कार्य है, कारण कार्य बिना जो पदार्थ भासे