योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 406, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४०५
होते हैं। जैसे बादलों के संयोग से आकाश धूमिल होता है, वैसे ही प्रमाद से संवित् दृश्यभाव को प्राप्त होती है; परन्तु और कुछ नहीं हो जाती। जैसे तरङ्ग उठने से जल और कुछ नहीं हो जाता और जैसे काष्ठ काटने में और कुछ नहीं हो जाना, वैसे ही द्रष्टा से दृश्य भिन्न नहीं होता। जैसे केले के खम्भे में पत्ते के सिवा और कुछ नहीं निकलता और पत्ते शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् भासित होता है, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं, शून्यरूप है। शीश, भुजा, नेत्र, चरण आदिक नाना अंग जो भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे सब शून्यरूप केले के पत्तों की नाईं हैं और सब असाररूप हैं। हे विद्याधर ! चित्त में रागरूपी मलीनता है। जब वैराग्यरूपी झाड़ू से झाड़िये, तब चित्त निर्मल हो। जैसे दीवार पर चित्र लिखे जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य आदि का यह सब जगत् संकल्परूपी चितेरे ने चित्र सदृश लिखे हैं। ये स्वरूप के विचार से निवृत्त हो जाते हैं। जब स्नेहरूप संकल्प फुरता है, तब भाव-अभावरूप जगत् फैल जाता है। जैसे जल में तेल के बूंद फैल जाते हैं और जैसे बाँस में अग्नि निकल-कर बाँस को दग्ध करती है, वैसे ही संकल्प इससे उपजकर इसी को खाते हैं। आत्मा में जो देश-काल-पदार्थ भासित होते हैं, वही अविद्या है-पुरुषार्थ से इसका अभाव करो। दो भाग साधुओं के संग और सत् कथा सुनकर नष्ट करो; तृतीय भाग को शास्त्र का विचार करके और चतुर्थ भाग को आत्मज्ञान का आप ही अभ्यास करके मिटाओ। इस उपाय से अविद्या नष्ट हो जावेगी और अशब्द, अरूपपद की प्राप्ति होगी।
विद्याधर ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों ने नाश से अशब्द-पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है ? और नाम-अर्थ का अभाव होने पर शेष क्या रहता है ? भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! संसार-समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विद्वान निर्वैर पुरुष हैं, उनका भली प्रकार टहल करना। इसमें अविद्या का अर्ध-भाग नष्ट होगा। तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास