योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५१३
है कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती दिखती है—तुम भी देखो; यह तो मैंने कुछ नहीं समझा कि आप क्या कहते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अनेक सृष्टियाँ उड़ती हैं, सो सुनो। पञ्चभौतिक शरीर में प्राण स्थित हैं। प्राण में चित्त स्थित है। और उस चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है। जब यह पुरुष शरीर का त्याग करता है, तब लिङ्गशरीर (जो वासना और प्राण है) उड़ता है। उस लिङ्गशरीर में जो विश्व है, वह सूक्ष्मदृष्टि से मुझको भासित होता है। हे राम! आकाश में जो वायु है, उसका रूपरङ्ग कुछ नहीं। वही वायु प्राणों से मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है। इसी का नाम जीव है। यथार्थ में न कोई आता है, न जाता है, परन्तु लिङ्गशरीर के संयोग से आता-जाता और जन्मता-मरता दीखता है। मनुष्य अपनी वासना के अनुसार आत्मा में विश्व देखता है। यह वासनामात्र सृष्टि है। जैसी वासना होती है, वैसा ही विश्व भासित होता है।
हे राम! यह पुरुष आत्मस्वरूप है, परन्तु लिङ्गशरीर के मिलने से इसका नाम जीव हुआ है। यह अपने को प्रच्छन्न जानता है; पर वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है। देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित ब्रह्म है, पर प्रमाद से अपने को कुछ का कुछ मानता है। इसी का नाम लिङ्गशरीर है। जैसे घटाकाश भी महाकाश है, परन्तु घट के खप्पर से परिच्छिन्न हुआ है, वैसे ही यह पुरुष भी आत्मस्वरूप है, और अहंकार के संयोग से प्रच्छन्न हुआ है। जैसे घट को एकदेश से उठाकर देशान्तर में ले जाकर रखो तो आकाश तो न कहीं गया और न आया, परन्तु आता-जाता लगता है, वैसे ही आत्मा अखण्डरूप है, परन्तु प्राण चित्त से चलता भासित होता है। जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो तब अखण्डरूप हो। जब तक अहंकार नहीं जाता, तब तक जगत् भ्रम दीखता है और वासना करके भटकता फिरता है। वासनामय सृष्टि अपने-अपने चित्त में स्थित है। जीव जब शरीर का त्याग करता है, तब आकाश में उड़ता है, और प्राणवायु उड़कर जो आकाश में शून्यरूप वायु है उससे जा मिलता है। वहाँ सबको अपनी-अपनी