योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४२५
हे राम ! यद्यपि वह विश्वरूप है, तो भी अहंकार से तुच्छ-सा हुआ है । जैसे घनघटा से भिन्न हुआ एक मेघ बादल कहाता है, और घट से अनन्त आकाश घटाकाश कहाता है, पर वह बादल भी मेघ है और घटाकाश भी महाकाश है, वैसे ही अहं के स्फुरण से जीव परिच्छिन्न हुआ है, सो फुरना दृश्य में हुआ है, और दृश्य फुरने में हुआ है । जैसे फूलों में गन्ध और तिलों में तेल है, वैसे ही फुरने में दृश्य है । हे राम ! आत्मा में बुद्धि आदिक स्फुरण है, अर्थात् जब 'मैं हूँ' ऐसे फुरता है, तब आगे दृश्य होता है और जब अहंकार होता है, तब आगे देह इन्द्रियादिक विश्व रचता है । इससे फुरने में दृश्य हुआ और फुरना दृश्य में हुआ । देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक जो दृश्य हैं, उनमें जीव के अहंप्रत्यय से फुरना हुआ है; इसी कारण इसकी जीवसंज्ञा हुई है । जब फुरना या अहंभाव नष्ट हो जावे तब आत्मा का साक्षात्कार हो । यह जन्म, मरण, आना, जाना आदि विकारों से युक्त प्रपञ्च भासित होता है तो भी मिथ्या है; क्योंकि विचार करने से कुछ नहीं रहता । जैसे केले के खम्भे में कुछ सार नहीं; वैसे ही विचार करने से प्रपञ्च नहीं रहता । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना जन्म, मरण, आना, जाना देखता है, परन्तु वह सब मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत् की सब क्रिया भी मिथ्या है ।
हे राम ! जो परावरदर्शी है, वह इन सब अवस्थाओं में निर्विकल्प है । वह जन्मता भी है । परन्तु नहीं जन्मता; और सब क्रिया करता भी है, परन्तु नहीं करता । वह सबको स्वप्नवत् समझता है; क्योंकि स्वरूप से कभी कुछ नहीं हुआ । हे राम ! ज्ञानी जाग्रत् में भी ऐसे ही देखता है । जब यह आत्मपद में जागता है, तब सब विकारों का अभाव हो जाता है, कोई विकार नहीं भासित होता । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह बँधा हुआ है; क्योंकि अभिलाषा ही दुःखदायक है । यद्यपि वह राजा हो, पर उसके हृदय में अभिलाषा है, इससे उसे दरिद्री जानो । जिस पुरुष का छादन, भोजन, शयन कष्ट से देखते हो, अर्थात् भोजन भिक्षा माँगकर अथवा किसी और यत्न से होता है, छादन भी साधारण सा पहिनता है और शयन करने