योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५०३
श्रेष्ठ हैं, क्योंकि निष्काम हैं। उनको विषयों में नीरसता है और उनका आचार शुभ है। हे राम ! ऐसे जिज्ञासु की संगति विशेष अच्छी है, जिसकी चेष्टा की सब कोई स्तुति करते हैं और वह सबको सुखदायक लगती है। जो जिज्ञासु के समान नवनीत कोमल, सुन्दर और स्निग्ध होता है, उसको सन्तों की संगति प्राप्त होती है।
हे राम ! फूलों के बगीचे और सुन्दर फूलों की शय्या आदि विषयों से भी ऐसा निर्भय सुख नहीं प्राप्त होता, जैसा सन्तों की संगति से प्राप्त होता है; क्योंकि उनका निश्चय सदा आत्मा में रहता है। हे राम ! ऐसे ज्ञानवानों की संगति करके जब हृदय शुद्ध होता है, तब आत्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है। जब तक हृदय मलिन है, तबतक उसकी प्राप्ति नहीं होती। जैसे उज्ज्वल आरसी प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, लोहे की शिला प्रतिबिम्ब को नहीं ग्रहण करती; वैसे ही जब हृदय उज्ज्वल होता है, सन्तों के वचन हृदय में ठहरते हैं। जैसे वर्षाकाल का बादल फैलकर थोड़े से बहुत हो जाता है, वैसे ही जब हृदय शुद्ध होता है तब बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे वन में केले का वृक्ष बढ़ता जाता है, वैसे ही बुद्धि बढ़ती जाती है। जब आत्मविषयिणी बुद्धि होती है, तब जीव वही रूप हो जाता है और बुद्धि की भिन्नसंज्ञा का अभाव हो जाता है। जैसे लोहे को पारस का स्पर्श होने पर वह सुवर्ण हो जाता है और फिर लोहे की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही आत्मपद की प्राप्ति होने से बुद्धि की संज्ञा नहीं रहती और विषयभोग की तृष्णा भी जाती रहती है। हे राम ! विषयों की तृष्णा और अभिलाषा ने जीव को दीन बनाया है। जब तृष्णा का त्याग करे, तब परम निर्मलता को प्राप्त होता है। जैसे हाथी जबतक शिर पर धूल डालता है तबतक मलिन रहता है और जब नदी में प्रवेश करता है, तब निर्मल हो जाता है, वैसे ही जब जीव तृष्णारूपी राख का त्याग करता है और आत्मा में स्थित होता है, तब निर्मल होता है। हे राम ! जब जीव भोगों की इच्छा त्यागता है, तब बड़ी शोभा पाता है। जैसे सुवर्ण को अग्नि में डालने से उसका मैल जल आता है और वह उज्ज्वल रूप धारण