भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 545

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

भासित होता है। जब विचार करके देखोगे, तब अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य तृणवत् भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बोधजगदेकताप्रतिपादनं नाम शताधिकैकाशीतितमसर्गः ॥ १८१ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जगत्जाल तुमने चिद्रूप होकर एक स्थान में बैठकर देखा अथवा सृष्टि में जाकर देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मैं अनन्त आत्मा, सर्वशक्तिसम्पन्न और सर्वव्यापी चिदाकाश हूँ। मुझमें आना जाना कैसे हो ? न एक स्थान में बैठकर देखा और न सृष्टि में जाकर देखा। हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ; मैंने चिदाकाश में ही यह सब देखा। हे राम ! जैसे तुम अपने अङ्गों को शिखा से लेकर नखपर्यन्त देखते हो, वैसे ही मैंने ज्ञाननेत्र से अपने आप ही में जगत् देखा, जो निराकार, निरवयव, आकाशरूप निर्मल, सावयव और फुरने से देख पड़ा है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल आकाशरूप है। जैसे स्वप्न में सृष्टि का अनुभव हो, परन्तु संवित्स्वरूप है, बना कुछ नहीं, और जैसे वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सब वृक्ष के अङ्ग होते हैं, वैसे ही ज्ञाननेत्र से मैंने जगत् को देखा। हे राम ! जैसे समुद्र अपने तरङ्ग, फेन, बुलबुले और जल को अपने आप ही में देखता है, वैसे ही मैं अपने आपमें जगत् को देखता हूँ। अब भी मैं इस देह में स्थित हुआ पर्वत की सृष्टि को ज्ञान से देखता हूँ। जैसे कुटी के भीतर-बाहर आकाश एकरूप है, वैसे ही मुझको आगे और अब भी आकाशरूप जगत् अपने आपमें भासित होते हैं। जैसे जल अपने रस को जानता है, बरफ अपनी शीतलता को जानता है और पवन अपनी स्पन्दनता को जानता है, वैसे ही मैंने ज्ञान से सृष्टि को अपने में देखा। जिस ज्ञानवान् पुरुष की शुद्ध बुद्धि में एकता हुई है, वह अपने को सर्वात्मा देखता है और जिसको आत्मस्थिति हुई है, वह अवेदन को भी अवेदन देखता है और कभी उपजा नहीं मानता। जैसे देवता अपने-अपने स्थान में बैठे हुए दिव्यनेत्रों मे कोटि योजनपर्यन्त अपने को विद्यमान देखते हैं, वैसे ही जगतों को मैंने सर्वात्म होकर देखा। जैसे पृथ्वी में जो निधि,

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 545, कुल 1734 में से · BharatKosha