भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५५१

इस जगत् को भी जानो। हे राम ! यह जो तुमको स्वप्न आता है, उसमें जो पुरुष और पदार्थ हैं, वे भी सत्य हैं, क्योंकि ब्रह्मसत्ता सर्वात्मा है। हे राम ! प्रबोध होने से भी स्वप्न के पदार्थ विद्यमान भासते हैं। इसी से कहा है कि स्वप्न, संकल्प और जाग्रत् तुल्य हैं। जैसे आगे शुक्र, ब्राह्मण के पुत्र इन्द्र, लवण और गाधि का उदाहरण कहा है। इनको मनोराज्यभ्रम प्रत्यक्ष हुआ है। दीर्घतपा को जिसका उदाहरण आगे कहेंगे, प्रत्यक्ष स्वप्न हुआ है। प्रत्येक जीव की अपनी सृष्टि है। संकल्प अपना-अपना है, इससे सृष्टि भिन्न-भिन्न है। पर सबका अधिष्ठान आत्म-सत्ता है। सब सृष्टि का प्रतिविम्ब आत्मरूपी आदर्श में होता है और सब सृष्टि आत्मा का अनुभव है। जैसे बीज में वृक्ष उत्पन्न होता है और उस वृक्ष से और वृक्ष होते हैं सो भी विचार से देखो कि बीज तो एक ही था और सब वृक्ष आदि उसी बीज से उपजे हैं, वैसे ही एक आत्मा से अनेक सृष्टियाँ प्रकाशित होती हैं, परन्तु स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं। जैसे एक पुरुष सोया है और उसको स्वप्न की सृष्टि भासती है और फिर स्वप्न में जो बहुत जीव भासते हैं उनको भी अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि भासती है।

हे राम ! जिससे आदि-स्वप्न की सृष्टि भासती है, वह पुरुष एक ही है। उसे एक ही में अनन्त सृष्टियाँ चित्त के फुरने से होती हैं। वैसे ही आत्मसत्ता के आश्रय से अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं। परन्तु स्वरूप में कुछ हुआ नहीं, सब आकाशरूप हैं। जीवों को अपनी-अपनी सृष्टि अज्ञान से भासती है। हे राम ! जीवों को अन्य सृष्टि का ज्ञान नहीं होता, वे अपनी ही सृष्टि को जानते हैं, क्योंकि संकल्प भिन्न-भिन्न हैं। कितनों के लेखे हम स्वप्नों के नर हैं और कितने ही हमारे लेखे स्वप्न के नर हैं। वे और सृष्टि में सोये हैं और हमारी सृष्टि उनको स्वप्न में दिखती है। जिनके लिए हम स्वप्न के नर हैं। और जो हमारी सृष्टि में सोये हैं, उनको स्वप्न में और सृष्टि भासित हुई है। वे हमारे स्वप्न के नर हैं। हे राम ! इस प्रकार आत्मतत्त्व के आश्रय से अनन्त सृष्टि भासती हैं। जो जीव सृष्टि को सत् जानकर विचरते