भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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पृष्ठ 581

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८१

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अग्नि से सब स्थान जल गये, तब उसके उपरान्त पुष्कल मेघ गर्जकर वर्षने लगे । प्रथम मूसल सी, फिर खंभा सी धारा वर्षी । फिर नदी की नाईं और फिर महानद् की नाईं मेघ बरसने लगे, जिनका गङ्गा यमुना नदी लहरें थीं । उनमे सब स्थान शीतल हो गये—जैसे तीनों तापों से जला हुआ अज्ञानी सन्तों के संग से शीतल होता है । हे राम ! फिर ऐसा जल बढ़ा, जिससे सुमेरु आदि पर्वत नृत्य करने लगे । जैसे समुद्र में झाग होते हैं, वैसे ही हो गये, अथवा ऐसे जान पड़ते थे, जैसे जलचर होते हैं । हे राम ! ऐसा जल बढ़ा कि कहा नहीं जाता । बड़े-बड़े स्थान और देवता, सिद्ध, गन्धर्व बहे जाते थे । जिनको अज्ञानी परमार्थ जानकर सेवन करते हैं, वे भी बहते देख पड़े । जैसे कोई पुरुष कष्टक के अन्धे कूप में गिरके दुःख पावे, वैसे ही वे दीखे, पर मुझको सब ब्रह्म ही देख पड़ता था । पर जब संकल्प की ओर देखता, तब महाप्रलय दीखता और मेघ गर्जते घटा होकर दिखाई देते थे । निदान ब्रह्मलोक तक जल चढ़ गया और मैं देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुआ ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजलमयवर्णनं नाम शताधिकत्रिनवतितमसर्गः ॥ १६३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस ब्रह्मा का जगत् जलमय हो गया और मुझे जल से भिन्न कुछ न देख पड़ा, सब शून्य ही देख पड़ा । ऊपर, नीचे और मध्य दिशा भी न दिखती थी । न कोई तत्त्व, न कोई पर्वत, न कोई देवता, न पशु और न पक्षी देख पड़ते थे । तब मैंने ब्रह्मपुरी को देखा कि इसकी क्या दशा है । फिर जैसे प्रातःकाल का सूर्य अपनी ज्योति को फैलाता है, वैसे ही मैंने ब्रह्मपुरी को दृष्टि फैलाकर देखा । तब ब्रह्माजी मुझको परम समाधि में देख पड़े, और भी जो जीवन्मुक्त ब्रह्मा के सभासद थे, वे भी सब पद्मासन से परमसमाधि लगाये बैठे थे । जैसे पत्थर की मूर्ति हो, वैसे ही सब परमसमाधि में अचल स्थित थे । उनमें संवेदन का फुरना नहीं था । चारों वेद मूर्ति धारण किये और बृहस्पति, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम, चन्द्रमा, अग्नि, देवता इत्यादि ऋषीश्वर मुनीश्वर