योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६०८ | योगवाशिष्ट ।
होता तैसे ही ज्ञानवान् राग द्वेष में रञ्जित नहीं होता । अब इच्छा और भय कल्पना से रहित स्वच्छ आत्मसत्ता सदा प्रफुल्लितरूप है और पुत्र, कलत्र, बान्धवों के स्नेह से रहित है और उसका हृदयकमल सर्व इच्छा और अहं मम से रहित अपने स्वरूप में सन्तुष्टवान् होता है । इससे मिथ्या देहादिकों की भावना को त्यागकर अपने नित्य, शुद्ध, शान्त और परमानन्दरूप में तू भी स्थित हो । तू तो परब्रह्म और निर्मलरूप है । इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे पावनबोधोनामविशांततमस्सर्गः ॥२०॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार पुण्यक ने पावन में बोध उपदेश किया तब पावन बोधवान् हुआ । तब दोनों ज्ञान के पारगामी और निरिच्छन्न आनन्दित पुरुष होकर चिरकाल पर्यन्त विचरते रहे और फिर दोनों विदेहमुक्त निर्वाण पद को प्राप्त हुए । जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही प्रारब्ध कर्म के क्षीण हुए दोनों विदेहमुक्त हुए । हे रामजी ! इसी प्रकार तू भी जान । जैसे वे मित्र, बान्धव, धना- दिक के स्नेह से रहित होकर विचरे तैसे ही तुम भी स्नेह से रहित होकर विचरो और जैसे उन्होंने विचार किया था तैसे ही तुम भी करो । इस मिथ्यारूप संसार में किसका इच्छा करें और किसका त्याग करें, ऐसे विचारकर अनन्त इच्छा और तृष्णा का त्याग करना, यही औषध है, तृष्णारूपी इच्छा का पालना औषध नहीं, क्योंकि पालने से पूर्ण कदा- चित् नहीं होती । जो कुछ जगत् है वह चित्त से उत्पन्न हुआ है और चित्त के नष्ट हुए संसार-दुःख नष्ट हो जाना है । जैसे काष्ठ के पाने से अग्नि बढ़ता जाता है और काष्ठ से रहित शान्त हो जाता है तैसे ही चित्त की चिन्तना से जगत् विस्तार पाता है और चिन्तना से रहित शान्त हो जाता है । हे रामजी ! ध्येय वासनावान त्यागोरूप रथ पर आरूढ़ होकर रहो, करुणा, दया और उदारतासंयुक्त होकर लोगों में विचरो और इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से रहित हो । यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुमसे कही । निष्काम, निर्दोष और स्वच्छस्वरूप को पाकर फिर मोह को नहीं प्राप्त होता । परम आकाश ही इसका हृदयमात्र विवेक है और बुद्धि इसकी सखी है जिसके निकट विवेक और बुद्धि है वे परमव्यवहार करते भी संकट