भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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पृष्ठ 632

६४० योगवाशिष्ठ ।

स्वरूप और सबका भरण और पोषण करनेवाला और वैराट्‌राज होकर स्थित भया हूँ । त्रिलोकी का राज्य मुझको अपूर्व प्राप्त हुआ है जो शास्त्रो और देवों के दल बिना निर्जित विस्तृत है । बड़ा आश्चर्य है कि में इतना बड़ा विस्तृतरूप हूँ और अपने आपमें नहीं समाता, जैसे कल्पान्तर के वायु से उछला समुद्र आपमें नहीं समाता । में अनन्तरूप आत्मा अपनी इच्छा से आप प्रकाशता हूँ । जैसे क्षीरसमुद्र अपनी उज्ज्वलता से शोभता है तैसे ही में भी अपने आपसे शोभता हूँ । यह जगतरूपी मटकी महाअल्परूप है—जैसे बिल में हाथी नहीं समाता तैसे ही में अपने आपमें विस्तृतरूप से जगत् में नहीं समाता । में कोटि ब्रह्माण्ड में व्यापक हूँ और ब्रह्मलोक से परे जो तत्त्वों का अन्त आता है उसके भी परे में अनन्तरूप हूँ । यह में हूँ, यह में नहीं, यह निर्बलता मेरे तुच्छ रूप है । में तो आदि अन्त से रहित चैतन्य आकाश हूँ और परे से परिच्छिन्नता मिथ्या भासती थी में, तू, यह, वह आदिक मिथ्या भ्रम है । देह क्या, पर क्या और अपर क्या, में तो सर्वव्यापक चैतन्यतत्त्व हूँ । मेरे पितामह बड़े नीचबुद्धि थे जो ऐसे ऐश्वर्य को त्यागकर तुच्छ ऐश्वर्य में स्वेचित हुए थे । कहाँ यह महादृष्टि सर्व का कर्ता ब्रह्मवपु और कहाँ वह संसारश्रम का राजा अनित्यरूप सुख भोग दुःखदायक । अनन्त सुख, परम उपशम स्वभाव, शुद्ध चैतन्य दृष्टि अब मेरे में हुई है । सब भाव पदार्थों में चेत्य से रहित में चैतन्य आत्मा स्थित हूँ । अब मुझको नमस्कार है, क्योंकि मेरी जय हुई है और जीर्णरूप संसारश्रम से निकला हूँ । इसमें मेरी जीत हुई है पाने योग्य आत्मपद पाया है और जीवन सार्थक हुआ है । ऐसा उत्तम समराज चक्रवर्ती में भी नहीं मिलना । ये जीव निरन्तर बोध को त्यागकर दुःखरूपी कार्यों में रमते हैं । काष्ठ जल और मृत्तिका से संयुक्त जो पृथ्वी है उसको पाकर जो भुलायमान हुए हैं उनको धिक्कार है, वे कीट हैं । यह द्रव्य ऐश्वर्य अविद्यारूप है, अविद्या से उपजते हैं और अविद्यारूप इनका बढ़ना है । इनमें क्या गुण है जिस निमित्त यत्न करते हैं । इस जगतरूपी मट्टी में कई वर्ष हिरण्यकशिपु ने राजसुख भोगा परन्तु उपशम जो शान्तिरूप है उसको न प्राप्त हुआ । उसने एक जगत