योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६४३
करता है और हेयोपादेय फांसी में बांधा है वह परमपद नहीं पा सकता जैसे पेट में बांधा पर्त्ता आकाशमार्ग में नहीं उड़ सकता। जो पुरुष सङ्कल्प कल्पना संयुक्त है वह मोहरूपी जाल में गिर पड़ता है—जैसे नेत्रों बिना मनुष्य गिर पड़ता है। सङ्कल्प कल्पनाजाल में जिनका चित्त वेष्टित है वह विषयरूपीगढ़े में गिरा है और अच्युतपदवी को प्राप्त नहीं होता । अरे पितामह कई दिन पृथ्वी में फुर-फुर के लीन हो गये हैं वे बालकवत् नीच थे, जैसे गढ़े में मच्छर लीन हो जाते हैं तैसे ही अज्ञान से वे परमतत्त्व को न जानते थे। भोगों की वाञ्छा जो दुःखरूप है अज्ञानी करते हैं और उनसे भाव अभावरूप गड्ढे और अन्धकूप में नष्ट होते हैं। और इच्छा और द्वेष से जो उठा है उसके बन्धायमान हुए हैं। जैसे पृथ्वी में कीट मग्न होते हैं वे जीव उनके तुल्य हैं और जिनकी मृगतृष्णारूप जगत् के पदार्थों में ग्रहण त्याग की बुद्धि शान्त हुई है वे पुरुष जीते हैं, और सब नीच मृतक रूप हैं कहाँ निर्मल और अविच्छिन्नरूप, चैतन्यचन्द्रमावत् शीतलता और कहाँ उष्ण-काल कलङ्क संयुक्त चित्त की आस्था । अब मेरे आत्मा को नमस्कार है जो अविच्छिन्न प्रकाशता है और प्रकाश और तम दोनों का प्रकाशरूप है। हे चिदात्मा देव ! मुझको तू चिरकाल में प्राप्त होकर परमानन्द हुआ है जो विकल्परूपी समुद्र से मेरा उद्धार किया है। जो तू है, वह में हूँ और जो में हूँ सो तू है तुझको नमस्कार है। सङ्कल्प विकल्प कल्पना के नष्ट हुए अनन्तशिव आत्मतत्त्व का चन्द्रमा सदा निर्मल और उदितरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपदेशो नाम चतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३४ ॥
प्रह्लाद बोले, कि जिनका नाम 'ॐ' है वह विकार से रहित ब्रह्म में हूँ । जो कुछ जगत् है वह सब आत्मस्वरूप, सत्य-असत्य से अतीत, चैतन्यस्वरूप और सब जीवों के भीतर है। सूर्यादिक में प्रकाश वही है, अग्नि आदिक को उष्णकर्ता वही है और चन्द्रमा में शीतकर्ता वही है । अमृत का स्रवना आत्मा में ही है और इन्द्रियों के भोगों का भोक्ता अनुभवरूप वही है । राजा की नाईं खड़ा बैठा हूँ तो में कभी नहीं बैठा और चलता हूँ तो कभी नहीं चलता और न व्यवहार करता हूँ। मैं सदा