योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 638, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६४६ योगवाशिष्ठ ।
मन में दुःख सुख की वासना नाश होती है सो भोगों से निवृत्त होकर सुख सम्पन्न होता है और ग्रहण करते भोगते अज्ञानी दुःख पाते हैं । यह बड़ा आश्चर्य है कि आत्मा के अज्ञान से मूढ़ दुःख पाता है । अब मैंने आत्मतत्त्व देखा है, उससे मेरा भ्रम शान्त हो गया है और कुछ भी किसी से मुझको क्षोभ नहीं अब मुझे न कुछ भोगों के ग्रहण करने की इच्छा है और न त्याग की वाञ्छा है, जो जावे सो जावे और जो प्राप्त हो सो हो, न मुझको देहादि के सुख की अपेक्षा है, न दुःख के निवृत्त की अपेक्षा है सुख दुःख आवे और जावे में एकरस चिदानन्दस्वरूप हूँ जिस देह में वासना करने से नाना प्रकार की वासना उपजती है वह देहभ्रम मेरा नष्ट हो गया है वह वासना नहीं फुरती । इतने कालपर्यन्त मुझको अज्ञानरूपी शत्रु ने नाश किया था अब मैंने आपको जाना है और अब इसको मैं चूर्ण करता हूँ । इस शरीररूपी वृक्ष में अहङ्काररूपी पिशाच था सो मैंने परमबोधरूपी मन्त्र से दूर किया है इससे पवित्र हुआ हूँ और प्रफुल्लित वृक्षवत् शोभता हूँ । मोहरूपी दृष्टि मेरी शान्ति हुई है, दुःख सब नष्ट हुए हैं और विवेकरूपी धन मुझको प्राप्त हुआ है । अब मैं परम ईश्वररूप होकर स्थित हुआ हूँ । जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना है और जो कुछ देखने योग्य था वह देखा है । अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ जिसके पाने से कुछ पाने योग्य नहीं रहता । अब मैंने आत्म-तत्त्व को देखा है, विपद्रूपी सर्प मुझको त्याग गया है, मोहरूपी कुहिग नष्ट हो गया है इच्छारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई और रागद्वेषरूपी धूलि से रहित सब ओर से निर्मल हुआ हूँ । अब में उपशमरूपी वृक्ष से शीतल हुआ हूँ और सब ओर से समतारूप को प्राप्त हुआ हूँ । जब मैंने सबसे उचित परमात्मा देव को ज्ञान और विचार से पाया है और प्रकट देखा है । अधोगति का कारण जो अहङ्कार है उसको मैंने दूर से त्याग दिया है और अपना स्वभावरूप जो आत्मभगवान् सनातन ब्रह्म है जो अहङ्कार के वश विस्मरण हुआ था उसे अब निरखाल करके देखा है । इन्द्रियरूपी गड्ढे में में गिरा था । और रागद्वेषरूपी सर्प से दुःख पाकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था । मृत्यु की भूमिका टोये विना तृष्णारूपी