योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण । ६५
को सङ्ग चला जाता हो सो सब एक क्षण वृक्ष की छाया के नीचे बैठते हैं फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं । जैसे उस यात्रा में स्नेह करना मूर्खता है वैसे ही इनमें भी स्नेह करना मूर्खता है । हे मुनीश्वर ! अहं ममता की रस्सी के साथ बाँधे हुए घटीयन्त्र की नाईं सब जीव भ्रमते फिरते हैं, उनको शान्ति कदाचित् नहीं होती । यह देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परन्तु पशु और बन्दर इन से श्रेष्ठ हैं जिनकी सम्मति देह और इन्द्रियों के साथ बँधी हुई है और आगमापायी है उनकी आत्मपद की प्राप्ति कठिन है । जैसे पवन से वृक्ष के पात टूट के उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्ष के साथ लगना कठिन है वैसे ही जो देहादिक से बाँधे हुए हैं उनको आत्म-पद का पाना कठिन है । हे मुनीश्वर ! जब आत्मपद से विमुख होता है तब जगत् को सत्य देखता है और जब आत्मपद की ओर आता है तब संसार इसको बड़ा विरस लगता है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जो स्थिर रहे जो कुछ पदार्थ हैं सो नाश को प्राप्त होते हैं । इससे मैं किसकी आस्था करूँ और किसका आश्रय करूँ सब तो नाशवन्त भासते हैं ? वह पदार्थ मुझसे कहिये जिसका नाश न हो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेसर्वपदार्थाभाववर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितना स्थावर जङ्गम जगत् दीखता है वह सब नाशरूप है, कुछ भी स्थिर न रहेगा । जो खाई थी वह जल में पूर्ण हो गई है और जो बड़े जल से भरे हुए समुद्र दीखते थे वे खाई-रूप हो गये; जो सुन्दर बड़े बगीचे थे वे आकाश की नाईं शून्य हो गये और जो शून्य स्थान थे वे सुन्दर वृक्ष होकर वन में दृष्टि आते हैं । जहाँ वस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गई और जहाँ उजाड़ थी वहाँ वस्ती हो गई । जहाँ गड्ढे थे वहाँ पर्वत हो गये और जहाँ बड़े पर्वत थे वहाँ समान पृथ्वी हो गई । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार पदार्थ देखते देखते विपर्यय हो जाते हैं, स्थिर नहीं रहते तो फिर में किसका आश्रय करूँ और किसके पाने का यत्न करूँ ? ये पदार्थ तो सब नाशरूप हैं । जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न और बड़े कर्तव्य करते और बड़े वीर्यवान् तेजवान् हुए हैं वे भी स्मरणमात्र