योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 681, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ६८६
तू भी राग-द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे तो तुझको दुःख कुछ न हो । जो वासना सहित कर्म करता है वह बन्धन का कारण होता है, वासना बिना कुछ दुःख नहीं होता । तू मूर्ख है जो विचार कर नहीं देखता । इसमें मैं तुझको त्याग करता हूँ। तेरे साथ मिलके मैं बड़े खेद पाता हूँ। जैसे भेडिये के बालक को सिंह चूर्ण करता है तैसे ही तूने मुझको चूर्ण किया है । तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हुआ हूँ । अब तेरे साथ मेरा प्रयो-जन कुछ नहीं, मैं तो निर्विकल्प शुद्ध चिदानन्द हूँ। जैसे महाकाश घट से मिलकर घटाकाश होता है तैसे ही तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हो गया हूँ । इस कारण में तेरा सङ्ग त्यागकर परम चिदाकाश को प्राप्त होऊँगा । मैं निर्विकार हूँ और अहं त्वं की कल्पना से रहित हूँ । तू क्यों अहं त्वं करता है ? शरीर में व्यर्थ अहं करनेवाला और कोई नहीं तू ही चोर है । अब मैंने तुझकी पकड़कर त्याग दिया है । तू तो अज्ञान से उपजा मिथ्या और असत्यरूप है जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल जानकर आप भय पाता है तैसे ही तूने सबको दुःखी किया है । जब तेरा नाश होगा तब आनन्द होगा । तेरे उपजने से महादुःख है-जैसे कोई ऊँचे पर्वत से गिरके कूप में जा पड़े और कष्टवान् हो तैसे ही तेरे सङ्ग से में आत्मपद से गिरा देह अभिमानरूपी गढ़े में रागद्वेषरूपी दुःख पाता था, पर अब तुझको त्यागकर में निरहंकार पद को प्राप्त हुआ हूँ । वह पद न प्रकाश है, न तम है, न एक है, न दो है, न बड़ा है और न छोटा है, अहं त्वं आदि से रहित अचैत्य चिन्मात्र है । जरा मृत्यु राग द्वेष और भय सब तेरे संयोग से होते हैं । अब तेरे वियोग से मैं निर्वि-कार शुद्ध पद को प्राप्त होता हूँ। हे मन ! तेरा होना दुःख का कारण है। जब तू निर्वीज हो जावेगा तब मैं ब्रह्मारूप होऊँगा । तेरे सङ्ग से मैं तुच्छ हुआ हूँ, जब तू निवृत्त होगा तब मैं शुद्ध होऊँगा-जैसे मेघ और कुहिरे के होने से आकाश मलीन भासता है पर जब वर्षा हो जाती है तब शुद्ध और निर्मल हो रहता है, तैसे ही तेरे निवृत्त हुए निर्लेप अपना आप आत्मा भासता है । हे चित्त ! ये जो देह इन्द्रियादिक पदार्थ हैं सो भिन्न हैं, इनमें अहं वस्तु कुछ नहीं, इनको एक तूने ही इकट्ठी किया है । जैसे