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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 702, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 702

उपशम प्रकरण । ७११

हुआ और परस्पर कण्ठ लगाके मिले फिर परस्परभाव करके एक आसन पर चन्द्रमा और सूर्य के समान दोनों बैठ गये और आपस में कुशल पूछने लगे । प्रथम परघ बोला, हे मित्र ! तेरे दर्शन से जैसे कोई चन्द्रमा के मण्डल में जा आनन्दवान् हो तैसे ही में आनन्दवान् हुआ हूँ । बहुत काल का जो वियोग होता है तो बहुत प्रीति बढ़ती है जैसे वृक्ष को ऊपर कांटे से बढ़ता है तैसे ही प्रीति बढ़ती है । हे साधो ! अब मैं भी ज्ञानवान् हुआ और तू भी माण्डव्य मुनि और आत्मा के प्रसाद से ज्ञान को प्राप्त हुआ है । हे राजन् ! मेरा अभीष्ट प्रश्न यह है कि तू अब दुःखों से मुक्त होकर विश्राम को प्राप्त हुआ है । आत्मपद पाने की बड़ाई मेरु आदिक से भी ऊँची है उसको तू प्राप्त हुआ है और परम कल्याणवान् आत्मारामी हुआ है । तुम रागद्वेष मल से रहित हुए हो-जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है-और सब कार्यों के करते भी ममभाव में रहते हो । आधि-व्याधि ताप तुम्हारे दूर हुए हैं; तुम्हारी प्रजा भी विगतज्वर हुई है और धन, राज्य और माल में भी कुशल है । जैसे चन्द्रमा की किरणें शीतलता फैलाती हैं तैसे ही तुम्हारा यश दशों दिशाओं में फैल रहा है और तुम्हारा यश ग्राम-वासी क्षेत्रों में लड़कियां गाती हैं । हे राजन् ! तुम्हारे प्रजा, नौकर, पुत्र और कलत्र सब आधि-व्याधि से रहित हुए हैं । विषय पदार्थ आपाता-रमणीय हैं उनमें अब तुम्हारी प्रीति नहीं है और तृष्णारूपी सर्पिणी तुमको अब तो नहीं डसती । हे राजन् ! तुम्हारी हमारी मित्रता हुई थी । समय पाकर तुम कहाँ रहे और हम कहाँ रहे, अब फिर इकट्ठे हुए हैं । बड़ा आश्चर्य है ? ईश्वर की नीति जानी नहीं जाती, सुख से दुःख हो जाता है और दुःख गये से सुख हो जाता है । संसार की दशा आरामपायी है, संयोग का वियोग होता है और वियोग का संयोग होता है । तैसे ही तुम्हारा हमारा भी संयोग का वियोग हो गया था और अब फिर वियोग का संयोग हुआ है । बड़ा आश्चर्य है-ईश्वर की नीति अद्भुतरूप है । सुरघ बोले, हे देव ! परमात्मा देव की नीति जान नहीं सकते । वह महा-गम्भीर विस्मय में देनेवाली और दुर्ज्ञात है । तुम्हारा हमारा वियोग