योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 709, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७१८ | योगवाशिष्ठ । |
|---|
लने का यत्न करो जब तत्त्व का अवलोकन करोगे तब चित्तभ्रम नष्ट हो जावेगा । हे रामजी ! संसाररूपी समुद्र के तरने का उपाय सुनो । महा-पुरुष और सन्तजन मल्लाह हैं, उनका युक्तिरूपी जहाज है उससे संसार-रूपी समुद्र तर जावेगा, और उपाय कोई नहीं यही परम उपाय है । जिस देश में सन्तजनरूपी वृक्ष नहीं हैं और जिनकी फलों सहित शीतल छाया नहीं है उस निर्जन मरुस्थल में एक दिन भी न रहिये । हे रामजी ! सन्तजनरूपी वृक्ष हैं, जिनके स्निग्ध और शीतल वचनरूपी पत्र हैं, प्रसन्न होना सुन्दर फूल है और निश्चय उपदेशरूपी फल है । जब यह पुरुष उनके निकट जावे तब महामोहरूपी तप्ता से छूटेगा और शान्ति पाकर तृप्त होगा । तभी तीनों को पाकर अघावेगा और सब दुःखों से मुक्त होगा हे रामजी ! अपना आपही मित्र है और अपना आपही शत्रु है । अपने आपको जन्मरूपी कीचड़ में न डाले । जो देह में अहंभावना से विषयों की तृष्णा करता है वह अपना आपही नाश करता है । जो देह भाव को त्यागकर आत्म अभ्यास करता है वह अपना आप उद्धार करता है और वह अपना आपही मित्र है और जो आपको संसारसमुद्र में डालता है यह अपना आपही शत्रु है । हे रामजी ! प्रथम यह विचारकर देखे कि जगत् क्या है, कैसे उत्पन्न हुआ है और कैसे निवृत्त होगा ? मैं कौन हूँ, सत्य क्या है और असत्य क्या है ? ऐसे विचार कर जो सत्य है उसको अङ्गीकार करे और जो असत्य है उसका त्याग करे । हे रामजी ! न धन कल्याण करता है न मित्र बान्धव और न शास्त्रकल्याण करते हैं, अपना उद्धार आपसे होता है । इससे तुम अपने मन के साथ मित्रता करो । जब वह दृढ़ वैराग्य और अभ्यास करे तब संसारकष्ट से छूटे । जब वैराग्य अभ्यास से तत्त्व के अवलोकन से अहंतारूप बेड़ी कटे तब संसार-समुद्र से तर जाता है । हे रामजी ! जीवरूपी हाथी जन्मरूपी गढ़े में गिरा हुआ है, तृष्णा और अहंकाररूपी जंजीर से बँधा है और कामनरूपी मद से उन्मत्त है । जब उनसे छूटे तब मुक्त हो । हे रामजी, हृदयरूपी औषध से अनात्म अभिमानरूपी रक्त रोग हो गया है, जब विचाररूपी नेत्रों से उसको दूर कीजिये तब आत्मरूपी सूर्य का दर्शन हो । हे रामजी ! और