योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण ।
<p align="right">७२१</p>और अब आत्मपद पाया है । क्या अब तुम्हारी बुद्धि शोक से रहित होकर विद्या तुमको फली है और तुम अब कुशलरूप हुए हो ? भास बोले, हे साधो ! अब हमको कुशल हुई जो तुम्हारा दर्शन हुआ । जगत् में कुशल कहाँ है, इस संसार में स्थित हुए हमको सुख और कुशल कहाँ है ? हे साधो ! जब तक ज्ञेय परमात्मतत्त्व को नहीं पाया, जब तक चित्तभूमिका क्षीण नहीं हुई और जबतक संसारसमुद्र को नहीं तरे तबतक कुशल कहाँ है ? जब तक चित्त से दुःख निवृत्त नहीं होता तब तक चित्त की भूमिका नष्ट नहीं होती । जब तक संसारसमुद्र से पार नहीं होते तब तक हमको सुख कहाँ है ? जब तक चित्तरूपी क्षेत्र में आशारूपी कणटकों की बेलि बढ़ती जाती है और आत्मविचाररूपी हँसिये से नहीं काटी जाती तब-तक हमको कुशल कहाँ, जब तक आत्मज्ञान उदय नहीं हुआ तबतक हमको कुशल कहाँ है ? हे साधो ! संसाररूपी विसूचिका रोग आत्म-ज्ञानरूपी औषध बिना दूर नहीं होता । सब जीव नित्य वही क्रिया कहते हैं जिससे दुःख प्राप्त हो इससे सुख को नहीं पाते । देहरूपी वृक्ष में बालअवस्थारूपी पत्र हैं और यौवन और वृद्ध अवस्थारूपी फल हैं सो मृत्यु के मुख में जा पड़ता है, उपजता है और फिर नष्ट होता है । यह सुख जो लवाकार है और दुःख जिसका दीर्घ से दीर्घ है । ऐसे जो शुभाशुभ आरम्भ हैं उनमें इनको दिन-रात्रि व्यतीत होते हैं । हे साधो ! चित्त रूपी हाथी वैराग्यरूपी जंजीर बिना तृष्णारूपी हथिनी के पीछे दूर से दूर चला जाता है । जैसे चील्ह पक्षी मांस की ओर जाता है तैसे ही चित्त विषयों की ओर धावता है और आत्मारूपी चिन्तामणि की ओर नहीं जाता । अहंकाररूपी चील्ह देहादिकरूपी मांस की ओर धावता है और सुखरूपी कमल अपानरूपी धूलि से धूसर हो जाता है और भोग-रूपी वरफ से नष्ट हो जाता है । हे साधो ! यह देहरूपी कूप में गिरा है, जिसमें भोगरूपी सर्प है, आशारूपी कणटक है और तृष्णारूपी जल है उसमें दुःख पाता है । हे साधो ! नाना प्रकार के रङ्गरञ्जनारूपी भोग हैं और जिसमें तृष्णारूपी चञ्चलता है ऐसे चैत्यदृश्य में मग्न है । चित्तरूपी ध्वजा कालरूपी वायु से हिलती है चित्तरूपी समुद्र में चिन्तारूपी भँवर