योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण। ७३३
है तो उसमें समुद्र को कुछ लेप नहीं होता तैसे ही मन के दुःख से आत्मा को क्षोभ नहीं होता । हे रामजी ! जैसे जल और हंस का और जल और नौका का कुछ सम्बन्ध नहीं तैसे ही देह और आत्मा का कुछ सम्बन्ध नहीं । जैसे पहाड़ और समुद्र का सम्बन्ध नहीं, जैसे जल, पत्थर और काष्ठ एक ठौर रहते हैं परन्तु कुछ सम्बन्ध नहीं और जैसे जल और नौका का संसर्ग होता है तो जलकणके उठते हैं तैसे ही देह और आत्मा के संयोग से चित्तवृत्ति फुरती है । हे रामजी ! जीव को दुःख संग से ही होता है । जहाँ अहं मम का अभिमान होता है वहाँ दुःख भी होता है और जहाँ अहं मम का अभिमान नहीं वहाँ दुःख भी कुछ नहीं होता । जैसे मछली को जल में ममत्व होता है और उसके वियोग से कष्ट पाती है तैसे ही जिस पुरुष को देह में अहं मम भाव है वह बड़ा कष्ट पाता है और जिसको देह में अभिमान नहीं उसको दुःख नहीं होता । हे रामजी ! ज्यों ज्यों मन से संसर्गता निवृत्त होती है त्यों त्यों भोग-प्रवाह कष्ट नहीं देता जैसे जल से पत्थर को कष्ट नहीं होता और जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है सो दर्पण को प्रतिबिम्ब का संग नहीं होता और कष्ट भी नहीं होता । तैसे ही जब देह से संसर्गभाव उठ जाता है तब कोई कष्ट नहीं होता । जैसे दर्पण को कुछ कष्ट नहीं होता तैसे ही आत्मा और जगत् की क्रिया है । हे रामजी ! सर्वथा संवित्मात्र आत्मतत्त्व स्थित है वह शुद्ध है और द्वैतशब्द के फुरने से रहित है । जो उसमें स्थित है उसको द्वैतशब्द नहीं फुरता और जो अज्ञानी है उसको द्वैतकल्पना उठती है । हे रामजी ! यह सब जीव अदुःखरूप हैं परन्तु अज्ञान से आपको दुःखी जानते हैं । जैसे स्थाणु में चोरभावना अविचार से होती है तैसे ही आत्मा में दुःख की भावना अविचार से होती है । यह जीव अशब्दरूप हैं परन्तु कलना के वश से आपको सम्बन्धी जानता है । जैसे स्वप्न में अङ्गना बन्धन करती है और स्थाणु में वैताल भासता है और भय प्राप्त होता है तैसे ही अपनी कल्पना से जीव बन्धवान् होता है । हे रामजी ! देह और आत्मा का सम्बन्ध असत्य है-जैसे जल और नौका का सम्बन्ध असत्य है । यदि जल का अभाव हो तो नौका को