योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य प्रकरण । ७३
आदिक मन्त्री, राजा दशरथ और मण्डलेश्वर, चाकर, नौकर और माता कौशल्या आदिक सब मौन हो गये-अर्थात् अचल हो गये। पिंजड़े में जो तोते और बगीचे में पशु आदि थे, जो पक्षी आलय में बैठे थे वे भी सुन कर मौन हो गये। आकाश के पक्षी जो निकट थे वे भी स्थिर हो गये और आकाश में देव, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर भी आके सुनने और फूलों की वर्षा करने तथा सब धन्य-धन्य शब्द करने लगे। उस समय फूलों की ऐसी वर्षा हुई मानो बर्फ की वर्षा होती है, और क्षीरसमुद्र के तरङ्ग उछलते आते थे मानो मोती की माला की वृष्टि होने लगी। जैसे माश्विन के पिंग उड़ते हैं इस प्रकार आधी घड़ी पर्यन्त फूलों की वर्षा हुई और बड़ी सुगन्ध फैली। फूलों पर भँवरे फिरने लगे और बड़ा बिलास उस काल में हुआ। सब "नमोनमः" शब्द करने लगे और देव बोले हे कमल नयन, रघुवंशी ! आकाश में चन्द्रमारूप तुम धन्य हो तुमने बड़े श्रेष्ठ स्थान देखे हैं और बहुत प्रकार के वचन सुने हैं। जैसे तुमने वचन कहे हैं वैसे हमने कभी नहीं सुने। यह वचन सुनके हमारा जो देवताओं का अभिमान था सो सब निवृत्त हो गया और अमृत रूपी वचन सुनकर हमारी बुद्धि पूर्ण हो गई। हे रामजी ! जैसे वचन तुमने कहे हैं ऐसे बृहस्पति भी नहीं कह सकते। तुम्हारे वचन परमानन्द के करनेवाले हैं इससे तुम धन्य हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सिद्धसमाजवर्णनन्नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! सिद्ध ऐसे वचन कहके विचारने लगे कि रघुवंश का कुल पूजने योग्य है, जिससे रामजी ने बड़े उदार वचन मुनीश्वर के सम्मुख कहे हैं। अब जो मुनीश्वर उत्तर देंगे वह भी सुनना चाहिए। जैसे फूल के ऊपर भँवरा स्थिर होता है वैसे ही व्यास, नारद, पुलह, पुलस्त्य आदि सब साधु सभा में स्थित हुए तब वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनीश्वर उठ खड़े हुए और उनकी पूजा करने लगे। पहिले राजा दशरथ ने पूजा की और फिर नाना प्रकार से सबने उनकी पूजा की और यथायोग्य आसन के ऊपर बैठे। उनमें नारदजी हाथ में बहुत