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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 726

उपशम प्रकरण । ७३५

है परन्तु भासता वही है जहाँ चित्त है। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब सब ठौर है परन्तु जहाँ आदर्श अथवा जल है वहाँ भासता है तैसे ही आत्मा जहाँ तहाँ पूर्ण है परन्तु शुद्ध हृदय में भासता है। आत्मा का प्रतिबिम्ब चित्त ही में भासता है और वह चित्त आत्मा की सत्ता से जगत् रचना फैलाता है व जैसे सूर्य की किरणें धूप को फैलाती हैं। हे रामजी! भूतों का कारण अन्तःकरण ही है, आत्मतत्त्व तो अतीत है, आदिकारण नहीं है वास्तव में कारण है। जगत् जो सत् भासता है सो अविचार से भासता है। उसी के निवृत्ति का उपाय आत्मज्ञान है। हे रामजी! संसार का कारण अन्तःकरण है और असम्यक्ज्ञान से सत्यरूप भासता है जैसे मरुस्थल में असम्यक्ज्ञान से जल भासता है। जब यथार्थ ज्ञान होता है तब जगत् का कारण चित्त से नष्ट हो जाता है। जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही आत्मज्ञान से चित्त नष्ट हो जाता है। संसार का कारण अपना चित्त ही है इसी का नाम जीव, अन्तःकरण, चित्त और मन है। रामजी ने पूछा, हे महाआनन्द के देनेवाले! इतनी संज्ञा चित्त की कैसे हुई हैं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! सर्वभावरूप एक परमात्मतत्त्व है। जैसे समुद्र, नदियाँ, तरङ्गादि संज्ञा एक जल ही धरता है तैसे ही चित्तादिक अनेक संज्ञा को आत्मा धारता है पर सदा एकरूप है, संवेदन फुरने से अनेक रूप धरता है। जैसे एक जल कहीं तरङ्ग कहीं बुद्बुदे, कहीं जल, कहीं चक्र और कहीं स्थिर—इतनी संज्ञा को धरता है परन्तु सब ही जल रूप है तैसे ही सर्वशक्ति आत्मा सब शरीरों में सर्वरूप होता है। जब स्पन्दकल्पना दूर होती है तब शुद्धस्वरूप हो भासता है और जहाँ अज्ञान-रूप संसरने को अङ्गीकार करता है वहाँ वही अनन्त आत्मा जीव कहाता है। जैसे केसरी सिंह पिंजड़े में फँसता है तैसे ही यह जीवरूप होता है। हे रामजी! जहाँ अहंभाव फुरता है वहाँ जीव कहाता है जहाँ निश्चय वृत्ति से फुरता है उसको बुद्धि कहते हैं, संकल्प-विकल्प से मन, चिन्ता करने से चित्त, और प्राकृतभाव से प्रकृति कहाता है। हे रामजी! प्रकृतिरूप जो पदार्थ है वह जड़ कहाता है और चेतन है सो जीव कहाता है। जड़ जो दृश्यभाव में संवित्भाग है और अजड़ जो जीव