योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ
पृष्ठ 74, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 74
वैराग्य प्रकरण । ७५
है वैसे ही मनुष्य बहुत हैं, परन्तु ऐसा कोई विरला ही होता है। ऐसे पात्र से थोड़ा अर्थ कहा भी बहुत हो जाता है। जैसे तेल की बूंद थोड़े ही जल में डालिये तो फैल जाती है वैसे ही थोड़े वचन तुम्हारे हिये में बहुत होते हैं। तुम्हारी बुद्धि बहुत विशेष है और दीपक सी प्रकाश-वाली और बोध का परम पात्र है। कहने मात्र से ही तुमको शीघ्र ज्ञान होवेगा और जो हमारे सामने तुमको ज्ञान न हो तो जानना कि हम सब मूर्ख बैठे हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे मुनिसमाजवर्णनन्नामा-ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
समाप्तमिदं वैराग्यप्रकरणम् ॥