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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 796, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 796

उपशम प्रकरण। ८०५

वृत्ति वहाँ स्थिर हो जाती है और बैठते, चलते, स्पर्श करते, सुगन्ध लेते, देखते, सुनते और सब इन्द्रियों की क्रिया करते भी मन स्थिर रहता है दृश्य का अभिमान नहीं फुरता वह अजड़ कहाता है और संवेदन से रहित सुखी होता है। हे रामजी ! ऐसी दृष्टि प्रथम तो कष्टरूप भासती है परन्तु पीछे सब दुःख का नाशकर्ता होती है, इससे इसी दृष्टि का आश्रय करके दुःखरूप जो संसारसमुद्र है उससे तर जाओ। जैसे वट का बीज सूक्ष्म होता है पर विस्तार को पाकर आकाश को स्पर्श करने लगता है तैसे ही सूक्ष्म संवेदन से जब संकल्प फैलता है तब वही बड़े जगत् के विस्तार को धारता है और जन्म के जाल को प्राप्त होता है। बीजरूप से आपही अपने को जन्मों में डालता और फिर फिर मोह में गिरता है। जब संवित् अपनी ओर होती है तब मोक्ष को प्राप्त होता है और जैसी भावना स्वरूप में दृढ होती है वही सिद्ध होती है। जैसे नटुआ अनेक स्वाँग को धारता है तैसे ही संवित् अनेक आकारों को धारती है। जब नट भूमिका को त्यागता है तब अपने स्वरूप में प्राप्त होता है। हे रामजी ! संवित्स्वरूप नटकी जगतरूप धारकर नृत्य करती है। जो दुःखरूप संसार-समुद्र में न गिरे सो सत्ता सब कारणों की कारण है और उसका कारण कोई नहीं और वही सब सारों का सार है उसका सार कोई नहीं। उसी चेतनरूपी बड़े दर्पण में समस्त जगत् प्रतिबिम्बित होता है। जैसे ताल में किनारे के वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं तैसे ही सब वस्तु चिद्दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है। हे रामजी! जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आत्मसत्ता से सिद्ध होते हैं और उसी अनुभव में सबका अनुभव होता है। जैसे षड्रसों का स्वाद जिह्वा से सिद्ध होता तैसे ही सब पदार्थ चिदाकाश के आश्रय सिद्ध होते हैं। जगद्गण उसी से उपजते हैं, उसी में वर्तते और बढ़ते हैं, उसी में स्थित दिखते हैं और उसी में लय होते हैं। सबका अधिष्ठान वही सत्ता है और गुरु का गुरु, लघु की लघुता, स्थूल की स्थूलता, सूक्ष्म की सूक्ष्मता, द्रव्यों का द्रव्य, कष्टों में कष्ट, बड़े में बड़ाई, तेज का तेज, तम का तम, वस्तु की वस्तु, द्रष्टा का द्रष्टा, किंचन में किंचन, निष्किंचन में निष्किंचन, तत्त्वों का तत्त्व, असत्य का असत्य, सत्य का सत्य, आश्रय में आश्रय और