भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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वैराग्य प्रकरण ।

रूपी समुद्र के पार करने को जहाज है और इससे सब जीव कृतार्थ होंगे । इतना कहकर ब्रह्माजी, जैसे समुद्र मे चक्र एक मुहूर्त पर्यन्त उठके फिर लीन हो जावे वैसे ही अन्तर्द्धान हो गये । तब मैंने भारद्वाज से कहा, हे पुत्र ! ब्रह्माजी ने क्या कहा ? भारद्वाज बोले हे भगवन् ! ब्रह्माजी ने तुमसे यह कहा कि हे मुनियों में श्रेष्ठ ! यह जो तुमने राम के स्वभाव के कथन का उद्यम किया है उसका त्याग न करना; इसे अन्तपर्यन्त समाप्ति करना क्योंकि; संसारसमुद्र के पार करने को यह कथा जहाज है और इससे अनेक जीव कृतार्थ होकर संसार संकट से मुक्त होंगे । इतना कहकर फिर वाल्मीकिजी बोले हे राजन् ! जब इस प्रकार ब्रह्माजी ने मुझसे कहा तब उनकी आज्ञानुसार मैंने ग्रन्थ बनाकर भारद्वाज को सुनाया । हे पुत्र ! वशिष्ठजी के उपदेश को पाकर जिस प्रकार रामजी निश्शंक हो विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरो । तब उसने प्रश्न किया कि हे भगवन् ! जिस प्रकार रामचन्द्रजी जीवन्मुक्त होकर बिचरे हैं वह आदि से क्रम करके मुझसे कहिये ? वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज ! रामचन्द्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता, कौशल्या, सुमित्रा और दशरथ ये आठ तो जीवन्मुक्त हुए हैं और आठ मन्त्री अष्टगण वशिष्ठ और वामदेव से आदि अष्टाविंशति जीवन्मुक्त हो बिचरे हैं उनके नाम सुनो । रामजी से लेकर दशरथपर्यन्त आठ तो ये कृतार्थ होकर परम बोधवान् हुए हैं और १ कुन्तभासी, २ शतवर्धन, ३ सुखधाम, ४ विभीषण, ५ इन्द्रजीत, ६ हनुमान्, ७ वशिष्ठ और ८ वामदेव ये अष्टमन्त्री निशङ्क हो चेष्टा करते भये और सदा अद्वैतनिष्ठ हुए हैं। इनको कदाचित् स्वरूप से द्वैतभाव नहीं फुरा है । ये अनामय पद की स्थिति में तृप्त रहकर केवल चिन्मात्र शुद्धपर परमपावनता को प्राप्त हुए हैं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणेकथारम्भवर्णनो नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥

भारद्वाज ने पूछा हे भगवन् ! जीवन्मुक्त की स्थिति कैसी है और रामजी कैसे जीवन्मुक्त हुए हैं वह आदि से अन्तपर्यन्त सब कहो ? वाल्मीकिजी बोले, हे पुत्र ! यह जगत् जो भासता है सो वास्तविक कुछ नहीं उत्पन्न हुआ; अविचार करके भासता है और विचार करने से