भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

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८२ योगवाशिष्ठ ।

तत्त्व अपने आप में स्थित है उसमें द्वैतभ्रम अविद्या में भामता है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेताल भामता है और भय पाता है वैसे ही अज्ञानी को कल्पना जगतरूप होकर भामती है। हे रामजी! व्यासजी को बत्तीस आकार से मैंने देखा है। उनमें दश एक आकार और क्रिया और निश्चयरूप हैं; दश अर्थ समान हुए हैं और बारह आकार क्रिया और चेष्टा में विलक्षण हुए हैं जैसे समुद्र में तरंगें होती हैं सो उनमें कई सम और कई विलक्षण उपजती हैं वैसे ही व्यास हुए हैं। तब जो दश हुए हैं उनमें दशवें व्यास यही हैं और आगे भी आठ बार वही होंगे और महाभारत कहेंगे। नवौं बेर बड़ा होकर विदेह मुक्त होगे। हम और वाल्मीकि, भृगु, और बृहस्पति का पिता अङ्गिरा इत्यादि भी विदेह मुक्त होवेंगे। हे रामजी! एक सम होते हैं और एक विलक्षण होते हैं। मनुष्य, देवता, तिर्यगादिक जीव कई बेर समान होते और कितनी बेर विलक्षण होते हैं। कितने जीव समान आकार आगे से कुल क्रिया सहित होते हैं। और कितने संकल्प में उड़ते फिरते। आना, जाना, जीना, मरना, स्वप्नभ्रम की भाँति दीखता है पर वास्तव में न कोई आता है, न जाता है, न जन्मता है, न मरता। यह भ्रम अज्ञान से भामता है, विचार करने में कुछ नहीं भामता। जैसे कदली का खंभ बड़ा पुष्ट दीखता है, पर यदि खोल के देखिये तो कुछ सार नहीं निकलता वैसे ही जगत-भ्रम अविचार में सिद्ध है; विचार करने से कुछ नहीं भामता। हे रामजी! जो पुरुष आत्मसत्ता में जगा है उसको द्वैतभ्रम नहीं भामता। वह आत्मदर्शी, सदा शान्त आत्मा परमानन्द स्वरूप और इच्छा से रहित है। जैसे जीवन्मुक्त को कोई चला नहीं सकता वैसे ही व्यास-देवजी को सदेहमुक्ति और विदेहमुक्ति का कुछ इच्छा नहीं, वे तो सदा अद्वैतरूप हैं। हे रामजी! जीवन्मुक्त को सर्वत्र सर्वात्मा पूर्ण भामता है। वह तो स्वरूप, सार, शान्तिरूप, अमृत में पूर्ण और निर्वाण में स्थित है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे असंकल्पसृष्टि- प्रतिपादनन्नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥