योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षु प्रकरण । =५.
भी दृढ़ अभ्यास हो तो पूर्व संस्कार को पुरुष प्रयत्न से जीत लेता है। जैसे पूर्व के संस्कार से दुष्कृत किया है और आगे सुकृत करे तो पिछले का अभाव हो जाता है सो पुरुष प्रयत्न से ही होता है। पुरुषार्थ क्या है और उससे क्या सिद्ध होता है सो श्रवण करिये। ज्ञानवान् जो मन्न हैं और सतशास्त्र जो ब्रह्मविद्या है उनके अनुसार प्रयत्न करने का नाम पुरुषार्थ है और पुरुषार्थ से पाने योग्य आत्मा है जिससे संसारसमुद्र से पार होता है। हे रामजी ! जो कुछ सिद्ध होता है सो अपने पुरुषार्थ से ही सिद्ध होता है—दूसरा कोई देव नहीं। जो शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ को त्याग-कर कहता है कि जो कुछ करेगा सो देव करेगा वह मनुष्य नहीं गर्दभ है उसका संग करना दुःख का कारण है। मनुष्य को प्रथम तो यह करना चाहिये कि अपने वर्णाश्रम के शुभ आचारों को ग्रहण करे और अशुभ का त्याग करे। फिर मंतों का संग और सतशास्त्रों का विचारना और उनको विचारकर अपने गुण दोष की भी विचार करना चाहिये कि दिन और रात्रि में क्या शुभ और अशुभ किया है। आगे फिर गुण और दोषों का भी साक्षीभूत होकर जो मन्तोष, धैर्य, विराग, विचार और अभ्यास आदि गुण हैं उनको बढ़ाये और जो दोष हों उनका त्याग करे। जब ऐसे पुरुषार्थ को अङ्गीकार करेगा तब परमानन्दरूप आत्म-तत्त्व को पावेगा। इससे हे रामजी ! जैसे बन का मृग घास, तृण और पत्तों को रमीला जानके खाता है वैसे ही स्त्री, पुत्र, बान्धव, धनादि में मग्न होना चाहिये। इनसे विरक्त होना और दाँतों से दाँतों को कच-कर संसारसमुद्र के पार होने का यत्न करना चाहिये। जैसे केसरी सिंह बल करके पिंजरे में से निकल जाता है वैसे ही निकल जाने का नाम पुरुषार्थ है। हे रामजी ! जिसको कुछ सिद्धता की प्राप्ति हुई है उसे पुरुष-ार्थ से ही हुई है, पुरुषार्थ बिना नहीं होती। जैसे प्रकाश बिना किसी पदार्थ का ज्ञान नहीं होता। जिस पुरुष ने अपना पुरुषार्थ त्याग दिया है और दैव के आश्रय हो यह समझता है कि हमारा दैव कल्याण करेगा वह कभी सिद्ध नहीं होगा जैसे पत्थर से तेल निकाला चाहे तो नहीं निक्लना वैसे ही उसका कल्याण दैव से न होगा। इसलिये हे रामजी !