योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १४५
विकल्पजाल भासित होकर अनेकभाव को प्राप्त होते हैं। आत्मा के अनेक नाम-रूप देखना और भिन्न-भिन्न देह, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि आदिक, अनेक में अहंप्रतीति से एकत्रभाव देखना अज्ञान है। यह कलना ज्ञान से नष्ट हो जाती है।
हे अर्जुन ! संकल्पजाल को त्याग करने को असंग कहते हैं। सब कलना-जाल को भी ईश्वर से भिन्न न जानने की भावना से द्वैतभाव गलित हो जाने का नाम ईश्वरसमर्पण है। हे अर्जुन ! जब ऐसी अभेद भावना होती है, तब आत्मबोध होता है। बोध में सब शब्द-अर्थ एकरूप भासित होते हैं, सब शब्दों का-एक ही शब्द भासित होता है और एक ही अर्थ सब शब्दों में भासित होता है। हे अर्जुन ! सब जगत में हूँ; दिशा और आकाश में हूँ। कर्म, काल, द्वैत, अद्वैत में ही हूँ। तुम मुझमें मन लगाओ, मेरी भक्ति करो, मेरा ही भजन करो और मुझही को नमस्कार करो, तब तुम मुझे ही प्राप्त होगे। हे अर्जुन ! में आत्मा हूँ और तुम मेरे ही परायण हो। अर्जुन बोले, हे देव ! आपके दो रूप हैं—एक पर और दूसरा अपर। उन दोनों रूपों में मैं किसका आश्रय करूँ, जिससे परमसिद्धि पाऊँ ?
श्रीभगवान् बोले, हे अनघ ! एक समानरूप है और दूसरा परमरूप है। यह शंख, चक्र, गदादि युक्त मेरा समानरूप है और परमरूप आदि-अन्त से रहित एक अनामय है। उस ब्रह्मरूप को आत्मा और परमात्मा आदि कहते हैं। जब तक तुम अप्रबुद्ध हो और तुमको अनात्म देहादिक में आत्मा-भिमान है, तब तक मेरे चतुर्भुज आकार की पूजा और कर्मों को करो। जब प्रबुद्ध होगे, तब मेरे परमरूप को पाओगे, जो आदि-अन्त-मध्य से रहित है। उसको पाकर फिर जन्म-मरण में न पड़ोगे। जब तुम मोह आदि शत्रुओं के नाशक और ज्ञानवान होगे, तब आत्मा से मेरा पूजन होगा। मैं सबका आत्मा हूँ। हे अर्जुन ! मैं मानता हूँ कि तुम अब प्रबुद्ध हुए हो, तुमने आत्मपद में विश्राम पाया है और संकल्पकलना से रहित एक आत्मसत्ता में स्थित होकर मुक्त हुए हो। ऐसे योग से तुम सब प्राणियों में स्थित आत्मा को देखोगे, और सब प्राणियों को