योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । १८७
जगत्भ्रम शान्त हो जावेगा। भ्रम भी कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि देह आदिक भ्रम भी कुछ नहीं हुआ। जैसे रस्सी के जाने से साँप का अभाव विदित होता है वैसे ही आत्मा के जाने से देहादिक का अत्यन्त अभाव हो जाता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विश्रान्तिवर्णनन्नाम पञ्चदशस्सर्गः ॥ १५ ॥
देवी बोली, हे लीले ! जितने कुन्ध शरीर तुझको भासते हैं सो सब स्वप्नपुर की नाईं हैं। जैसे स्वप्न में शरीर भासता है, पर जब निज स्वरूप में स्मृति होती है तब स्वप्न का शरीर सत्य नहीं भासता। जैसे सङ्कल्प के त्यागने से सङ्कल्परूप शरीर नहीं भासता। वैसे ही बोधकाल में यह शरीर भी नहीं भासता। जैसे मनोराज के त्यागने से मनोराज का शरीर नहीं भासता वैसे ही यह शरीर भी नहीं भासता। जब स्वरूप का ज्ञान होगा तब यह भी वास्तव न भासेगा। जैसे स्वरूप स्मरण होने पर स्वप्न शरीर शान्त होता है वैसे ही वासना के शान्त होने पर जाग्रत शरीर भी शान्त हो जाता है। जैसे स्वप्न का देह जागने से असत् होता है वैसे ही जाग्रत शरीर की भावना त्यागने से यह भी असत् भासता है। इसके नष्ट होने पर अन्तवाहक देह उदय होवेगा। जैसे स्वप्न में राग द्वेष होता है और जब पदार्थों की वासना बोध से निर्बीज होती है तब उनसे मुक्त होता है वैसे ही जिस पुरुष की वासना जाग्रत पदार्थों में नष्ट हुई है सो पुरुष जीवन्मुक्त पद को प्राप्त होता है। और यदि उसमें फिर भी वासना दृष्ट आवे तो वह वासना भी निर्वासिना है। सो सर्व कल्पनाओं से रहित है उसका नाम सत्तासामान्य है। हे लीले ! जिस पुरुष ने वासना रोकी है और ज्ञाननिद्रा से आवर्या हुआ है उसको सुषुप्तिरूप जान। उसकी वासना सुषुप्ति है और जिसकी वासना प्रकट है और जाग्रतरूप से विचरता है उसको अधिक मोह से आवर्या जानिये। जो पुरुष चेष्टा करता दृष्टि आता है और जिसकी अन्तःकरण की वासना नष्ट हुई है उसको तुरीया जान। हे लीले ! जो पुरुष प्रत्यक्ष चेष्टा करता है और अन्तःकरण की वासना से रहित है वह जीवन्मुक्त है। जिस
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पुरुष का चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है उसको जगत् की वासना नष्ट हो जाती है और जो वासना फुरती भासती है तो भी सत्य जानके नहीं फुरती । जब शरीर की वासना नष्ट होती है तब आधिभौतिकता नष्ट हो जाती है और अन्तवाहकता आन प्राप्त होती है । जैसे बर्फ की पुतली सूर्य के तेज से जलरूप हो जाती है वैसे ही आधिभौतिकता क्षीण होकर अन्तवाहकता प्राप्त होती है । जब अन्तवाहकता प्राप्त होती है तब शरीर आभासमय चित्तरूप होता है और अपने जन्मान्तरों, व्यतीत सृष्टि का सब ज्ञान हो आता है । तब वह जहाँ जाने की इच्छा करता है वहाँ जा प्राप्त होता है और यदि किसी सिद्ध के मिलने अथवा किसी के देखने की इच्छा करे सो सब कुछ सिद्ध होता है, परन्तु अन्तवाहक बिना शक्ति नहीं होती । जब इस देह से तेरा अहंभाव उठेगा तब सब जगत् तुझको प्रत्यक्ष भासेगा । हे लीले ! जब आधि-भौतिक शरीर की वासना नष्ट होती है तब अन्तवाहक देह होती है और जब अन्तवाहक में वृत्ति स्थित होती है तब ओर के संकल्प की सृष्टि भासती है । इससे तू वासना घटाने का यत्न कर । जब वासना नष्ट होगी तब तू जीवन्मुक्त पद को प्राप्त होगी । हे लीले ! जब तक तुझको पूर्ण बोध नहीं प्राप्त होगा तब तू अपनी इस देह को यहाँ स्थापन कर वह सृष्टि चलकर देख । जैसे अन्तवाहक शरीर से मांसमय स्थूल देह का व्यवहार नहीं सिद्ध होता वैसे ही स्थूल देह से सूक्ष्म कार्य नहीं होता । इससे तू अन्तवाहक शरीर का अभ्यास कर । जब अभ्यास करेगी तब वह सृष्टि देखने को समर्थ होगी हे लीले ! जैसे अनुभव में स्थित होती है सो मैंने तुझसे कही । यह वार्ता बालक भी जानते हैं कि यह वर और शाप की नाईं नहीं है । जब अपना आप ही अभ्यास करेगी तब बोध की प्राप्ति होगी । हे लीले ! सब जगत् अन्तवाहकरूप है अर्थात् संकल्परूप और अबोधरूप है । संकल्प के अभ्यास से आधिभौतिक उत्पन्न हुआ है, इससे संसार की वासना दृढ़ हुई है और जन्म मरण आदि विकार चित्त में भासते हैं । जीव न मरता है और न जन्मता है । जैसे स्वप्न में जन्म मरण भासते हैं और जैसे संकल्प से भ्रम भासता है वैसे ही जन्म मरण भ्रम
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से भासता है। जब तुम आत्मपद का अभ्यास करोगी तब यह विकार मिट जावेगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी। लीला ने पूछा हे देवि ! तुमने मुझसे परम निर्मल उपदेश किया है जिसके जानने से दृश्य विसूचिका निवृत्त होती है, पर वह अभ्यास क्या है, बोध का साधन कैसे होता है, अभ्यास पुष्ट कैसे होता है और पुष्ट होने से फल क्या होता है ? देवी बोली, हे लीले ! जो कुछ कोई करता है सो अभ्यास बिना सिद्ध नहीं होता। सबका साधक अभ्यास है। इससे तू ब्रह्म का अभ्यास कर। हे लीले ! चित्त में आत्मपद की चिन्तना, कथन, परस्पर बोध, प्राणों की चेष्टा और आत्मपद के मनन को ब्रह्माभ्यास कहते हैं। बुद्धिमान् चिन्तना किसको कहते हैं सो भी सुन। शास्त्र और गुरु से जो महावाक्य श्रवण किये हैं उनको युक्तिपूर्वक विचारना और कथन करना चिन्तना कहाता है। शिष्यों को उपदेश करना, परस्पर बोध करना और निर्णय करके निश्चय करना, इन तीनों के परायण रहने को बुद्धिमान् ब्रह्म अभ्यास कहते हैं। जिन पुरुषों के पाप अन्त को प्राप्त हुए हैं और पुण्य बचे हैं वे रागद्वेष से मुक्त हुये हैं, उनको तू ब्रह्मसेवक जान। हे लीले ! जिन पुरुषों को रात्रिदिन अध्यात्म शास्त्र के चिन्तन में व्यतीत होते हैं और वासना को नहीं प्राप्त होते उनको ब्रह्माभ्यासी जान—वे ब्रह्माभ्यास में स्थित हैं। हे लीले ! जिनकी भोगवासना क्षीण हुई है और संसार के अभाव की भावना करते हैं वे विरक्तचित्त महात्मा पुरुष भव्यमूर्ति शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होते हैं और जिनकी बुद्धि वैराग्यरूपी रङ्ग में रँगी है और आत्मानंद की ओर वृत्ति धावती है ऐसे उदार आत्माओं को ब्रह्माभ्यासी कहते हैं। हे लीले ! जिन पुरुषों ने जगत् का अत्यन्त अभाव जाना है कि यह आदि से उत्पन्न नहीं हुआ और दृश्य को असत् जानके त्यागते हैं, परमतत्त्व को सत्य जानते हैं और इस युक्ति से अभ्यास करते हैं वे ब्रह्माभ्यासी कहाते हैं। जिस पुरुष को दृश्य की असम्भवता का बोध हुआ है और इस बुद्धि का भी जो अभाव करके परमात्मपद की प्राप्ति करते हैं सो ब्रह्माभ्यासी कहाते हैं। हे लीले ! दृश्य के अभाव जाने बिना राग और द्वेष निवृत्त नहीं होते।
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रागद्वेष बुद्धि इस लोक में दुःखों को प्राप्त करती है और जिसको दृश्य की असम्भव बुद्धि प्राप्त हुई है उसको यज्ञ अर्थात् परमात्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है । जब उस पद में दृढ़ अभ्यास होता है तब परमानन्द निर्वाण पद को प्राप्त होता है और जो जगत् के अभाव के निमित्त यत्न करता है वह प्राकृत है, हे लीले ! बोध का साधन अभ्यास है, अभ्यास शास्त्र से होता है, प्रयत्न से पुष्ट होता है और पुष्ट होने से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है । हे लीले ! जिनको ब्रह्माभ्यासी वा ब्रह्म के सेवक कहते हैं वे तीन प्रकार के हैं-एक उत्तम दूसरे मध्यम और तीसरे प्राकृत । उत्तम अभ्यासी वह है जिसको बोधकला उत्पन्न हुई है और दृश्य का असम्भव बोध हुआ है जिसको दृश्य का असम्भव बोध हुआ है पर बोधकला नहीं उपजी और वह उसके अभ्यास में है वह मध्यम है । जिसको दृश्य का असम्भव बोध नहीं हुआ और सदा यही हृदय में रहता है कि दृश्य का असम्भव हो वह प्राकृत है । इससे जिस प्रकार मैंने तुझको अभ्यास कहा है वैसे ही अभ्यास करने से तू परमपद को प्राप्त होगी। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे अज्ञानरूपी निद्रा में जीव शयन कर रहा है, उसमे जगत् को नाना प्रकार का देखता है वैसे ही अविद्यारूपी निद्रा में विवेकरूपी वचनों के जल की वर्षा करके जब देवी ने लीला को जगाया तब उसकी अज्ञानरूपी निद्रा ऐसे नष्ट हो गई जैसे शरत् काल में मेघ का कुहड़ा नष्ट हो जाता है । वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा तो सायंकाल का समय हुआ और सर्व सभा परस्पर नमस्कार करके स्नान को गई और जब सूर्य की किरणें उदय हुईं तब फिर सब आ स्थित हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे विज्ञानाभ्यासवर्णनन्नाम षोडशसर्गः ॥ १६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार अर्धरात्रि के समय देवी और लीला का संवाद हुआ । उस समय सब लोग और सहेलियाँ बाहर पड़ी सोती थीं और लीला का भर्त्ता फूलों में दबा हुआ था । उसके पास दिव्य वस्त्र पहिरे हुए चन्द्रमा की कान्ति के समान सुन्दर देवियाँ सब कल-
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नाओं को त्यागके और अङ्गों को सङ्कोचकर ऐसी समाधि में स्थित भईं मानों रत्न के थम्भ से पुतलियाँ उत्कीर्ण किये स्थित हैं। अन्तःपुर भी उनके प्रकाश से प्रकाशमान हुआ और वे ऐसी शोभा देती थीं मानों कागज के ऊपर मूर्तियाँ लिखी हैं। इस प्रकार सब दृश्य कल्पना को त्याग के वे निर्विकल्प समाधि में स्थित हुईं । जैसे कल्पवृक्ष की लता दूसरी ऋतु के आने से अगले रस को त्याग के दूसरी ऋतु के रस को अङ्गीकार करती है वैसे ही वे सब दृश्यभ्रम को त्याग आत्मतत्त्व में स्थित हुईं और अहंसत्ता से आदि में लेकर उनका दृश्यभ्रम शान्त हो गया । दृश्यरूपी पिशाच के शान्त होने पर जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है वैसे ही वे निर्मलभाव को प्राप्त हुईं । हे रामजी ! यह जगत् शश के शृङ्ग की नाईं असत् है । जो आदि न हो अन्त भी न रहे और वर्तमान में दृष्टि आवे यह असत् जानिये । जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य है वैसे ही वह जगत् भी असत्य है । ऐसे जब स्वभावसत्ता उनके हृदय में स्थित हुई तब अन्य सृष्टि के देखने का जो सङ्कल्प था सो आन फुरा । उस फुरने में वे आकाशरूप देह से चिदाकाश में उड़ीं और सूर्य और चन्द्रमा के मण्डलों को लाँघकर दूर से दूर जाकर अनन्त योजनपर्यन्त स्थान लाँघे । फिर भूतों की सृष्टि देखी उसमें प्रवेश किया ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलाविज्ञान देहाकाशभागमन-नाम सप्तदशस्सर्गः ॥ १७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार परस्पर हाथ पकड़कर वे दूर से दूर गईं मानों एक ही आसन पर दोनों चली जाती हैं । जहाँ मेघों के स्थान और अग्नि और पवन के वेग नदियों की नाईं चलते थे और जहाँ निर्मल आकाश था वहाँ से भी आगे गईं । कहीं चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश ही न था और कहीं चन्द्रमा और सूर्य प्रकाशमान थे; कहीं देवता विमानों पर आरूढ़ थे, कहीं सिद्ध उड़ते थे और कहीं विद्याधर, किन्नर और गन्धर्व गान करते थे । कहीं सृष्टि उत्पन्न होती; कहीं प्रलय होती और कहीं शिखाधारी तारे उपद्रव करते उदय हुए थे । कहीं प्राणी अपने व्यवहार में लगे हुए; कहीं अनेक महापुरुष ध्यान में स्थित;
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कहीं हस्ति, पशु पक्षी और दैत्य-डाकिनी विचरते और योगनियाँ लीला करती थीं । कहीं अन्धे गंगे रहते थे, कहीं गीध पक्षी; सिंह और घोड़े के मुखवाले गण विचरते और कहीं वरुण, कुबेर, इन्द्र, यमादिक लोकपाल बैठे थे । कहीं बड़े पर्वत सुमेरु, मंदराचल आदि स्थित कहीं अनेक योजन पर्यन्त वृक्ष ही चले जाते; कहीं अनेक योजन पर्यन्त अविनाशी प्रकाश; कहीं अनेक योजन पर्यन्त अविनाशी अन्धकार; कहीं जल से पूर्ण स्थान; कहीं सुन्दर पर्वतों पर गङ्गा के प्रवाह चले जाते और कहीं सुन्दर बगीचे, बावड़ी ताल और उनमें कमल लगे हुए थे । कहीं भूत भविष्यत् होता, कहीं कल्पवृक्षों के वन, कहीं अनन्त चिन्तामणि; कहीं शून्य स्थान; कहीं देवता और दैत्यों के बड़े युद्ध होते और नक्षत्रचक्र फिरते और कहीं प्रलय होता था । कहीं देवता विमानों में फिरते; कहीं स्वामिकार्तिक के रक्खे हुए मोरों के समूह विचरते; कहीं कुक्कुट आदि पक्षी विद्याधरों के वाहन विचरते और कहीं यम के वाहन महिषों के समूह विचरते थे । कहीं पाषाण संयुक्त पर्वत; कहीं भैरव के गण नृत्य करते; कहीं विद्युत् चमकती; कहीं कल्पतरु; कहीं मन्द-मन्द शीतल पवन सुगन्ध समेत चलती और कहीं पर्वत रत्न और मणि शोभते थे । निदान इसी प्रकार अनेक जगज्जाल उन देवियों ने देखे । जीवरूपी मच्छड़ त्रिलोकरूपी गूलर के फूलों में देखें । इसके अनन्तर उन्होंने भूमण्डल को देख के महीतल में प्रवेश किया ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने आकाशगमन-वर्णनन्नामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! तब देवियों ने भूतल ग्राम में आकर ब्रह्माण्ड खप्पर में प्रवेश किया । वह ब्रह्माण्ड त्रिलोकरूपी कमल है और उसकी अष्ट पंखुड़ियाँ हैं । उसमें पर्वतरूपी डोड़ा है; चेतनता सुगन्ध है और नदियाँ समुद्र अम्बुकगण हैं । जब रात्रिरूपी भँवरे उस पर आन विराजते हैं तब वे कमल सकुचाय जाते हैं वे पातालरूपी कीचड़ में लगे हैं; पत्ररूपी मनुष्य देवता हैं; दैत्य राक्षस उसके कण्टक हैं और डोड़ा उसका शेषनाग है । जब वह हिलता है तब भूचाल होता है और दिन-
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कर से प्रकाशता है । इसका विस्तार इस प्रकार है कि एक लाख योजन जम्बूद्वीप है और उसके परे दुगुना खारा समुद्र है । जैसे हाथ का कङ्कण होता है वैसे ही उस जल में वह द्वीप आवरण किया है । उससे और दुगुना शाकद्वीप है और उससे दुगुने क्षीरसमुद्र से वेष्टित है । उसके आगे उससे दुगुनी पृथ्वी है जिसका नाम कुशद्वीप है और उससे दूने घृत के समुद्र से वेष्टित है । उसके आगे उससे दूनी पृथ्वी का नाम क्रौञ्चद्वीप है वह अपने से दूने दधि के समुद्र से वेष्टित है । फिर शाल्मलीद्वीप है और उससे दूना मधु का समुद्र उसके चारों ओर है । फिर प्लक्षद्वीप है उससे दूना इक्षुरस का समुद्र है । फिर उससे दूना पुष्करद्वीप है और उससे दूना मीठे जल का समुद्र उसे घेरे है इस प्रकार सप्त समुद्र हैं । उससे परे दशकोटि योजन कञ्चन की पृथ्वी प्रकाशमान है और उससे आगे लोकालोक पर्वत है और उन पर बड़ा शून्य बन है । उससे परे एक बड़ा समुद्र है । समुद्र से परे दशगुणी अग्नि है; अग्नि से परे दशगुणी वायु है; वायु से परे दशगुणा आकाश है और आकाश से परे लक्ष योजन पर्यन्त घनरूप ब्रह्माण्ड का कन्ध है उसको देख के दोनों फिर आईं ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने भूलोकगमनवर्णन- न्नामैकोनविंशत्सर्गः ॥ १९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वहाँ से फिर उन्होंने वशिष्ठ ब्राह्मण और अरुन्धती का मण्डल, ग्राम और नगर को देखा कि शोभा जाती रही है । जैसे कमलों पर धूल की वर्षा हो और कमल की शोभा जाती रहे; जैसे वन को अग्नि लगे और वन लक्ष्मी जाती रहे; जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को पान कर लिया था और समुद्र की शोभा जाती रही थी; जैसे तेल और बाती के पूर्ण होने से दीपक के प्रकाश का अभाव हो जाता और जैसे वायु के चलने से मेघ का अभाव होता है वैसे ही ग्राम की शोभा का अभाव देखा । जो कुछ प्रथम शोभा थी सो सब नष्ट हो गई थी और दासियाँ रुदन करती थीं । तब लीला रानी को जिसने चिरकाल तप और ज्ञान का अभ्यास किया था, यह इच्छा उपजी
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कि मुझे और देवी को मेरे बान्धव देखें । तब लीला के सत्यसंकल्प से उसके बान्धवों ने उनको देखकर कहा कि यह वनदेवी गौरी और लक्ष्मी आई हैं इनको नमस्कार करना चाहिए । वशिष्ठ के बड़े पुत्र ज्येष्ठशर्मा ने फूलों से दोनों के चरण पूजे और कहा, हे देवि ! तुम्हारी जय हो । यहाँ मेरे पिता और माता थे, अब वह दोनों काल के वश स्वर्ग को गये हैं इससे हम बहुत शोकवान् हुए हैं । हम को त्रैलोक शून्य भासते हैं और हम सब रुदन करते हैं । वृक्षों पर जो पक्षी रहते थे सो भी उनको मृतक देख के वन को चले गये; पर्वत की कन्दरा से पवन मानों रुदन करता आता है, और नदी जो वेग में आती है और तरङ्ग उछलते हैं मानों वह भी रुदन करते हैं । कमलों पर जो जल के कण हैं मानों कमलों के नयनों से रुदन करके जल चलता है और दिशा से जो उष्ण पवन आता है मानो दिशा भी उष्ण श्वासें छोड़ती है । हे देवियो ! हम सब शोक को प्राप्त हुए हैं । तुम कृपा करके हमारा शोक निवृत्त करो, क्योंकि महापुरुषों का समागम निष्फल नहीं होता और उनका शरीर परोपकार के निमित्त है । हे रामजी ! जब इस प्रकार ज्येष्ठ-शर्मा ने कहा तब लीला ने कृपा करके उसके शिर पर हाथ रक्खा और उसके हाथ रखते ही उसका सब ताप नष्ट हो गया । और जैसे ज्येष्ठ-आषाढ़ के दिनों में तपी हुई पृथ्वी मेघ की वर्षा होने से शीतल हो जाती है वैसे ही उसका अन्तःकरण शीतल हुआ । जो वहाँ के निर्धन थे वह उनके दर्शन करने से लक्ष्मीवान् होकर शान्ति को प्राप्त हुए और शोक नष्ट हो गया और सूखे वृक्ष सफल हो गये । इतना सुन रामजी बोले, हे भगवन् ! लीला ने अपने ज्येष्ठशर्मा को मातारूप होकर दर्शन क्यों न दिया, इसका कारण मुझसे कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्ध आत्मसत्ता में जो स्पन्द संवेदन हुई है सो संवेदन भूतों का पिण्डाकार हो भासती है और वास्तव में आकाशरूप है भ्रान्ति से पृथ्वी आदिक भूत भासते हैं । जैसे बालक को छाया में भ्रम से वेताल भासता है वैसे ही संवेदन के फुरने से पृथिव्यादिक भूत भासते हैं । जैसे स्वप्न में भ्रम से पिण्डाकार भासते हैं और जगने पर आकाशरूप भासते हैं वैसे
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भ्रम के नष्ट होने पर पृथ्वी आदि भूत आकाशरूप भासते हैं । जैसे स्वप्न के नगर स्वप्नकाल में अर्थाकार भासते हैं और अग्नि जलाती है पर जागने से सब शून्य हो जाती है वैसे ही अज्ञान के निवृत्त होने से यह जगत् आकाशरूप हो जाता है । जैसे मूर्च्छा में नाना प्रकार के नगर; परलोक जगत्; आकाश में तरुवरे और मुक्तमाला और नौका पर बैठे तट के वृक्ष चलते भासते हैं वैसे ही यह जगत् भ्रम से अज्ञानी को भासता है और ज्ञानवान् को सब चिदाकाश भासता है—जगत् की कल्पना कोई नहीं फुरती । इससे लीला उसको पुत्रभाव और अपने को मातृभाव कैसे देखती । उसका अह और मम भाव नष्ट हो गया था । जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार नष्ट होता है वैसे ही लीला का अज्ञानभ्रम नष्ट हो गया था और सब जगत् उसको चिदाकाश भासता था । इस कारण वह अपने को माताभाव न जानती भई । जो उसमें कुछ ममत्व होता तो उसको माताभाव से देखती, परन्तु उसको यह अहं मम-भाव न था इस कारण देवीरूप में दिखाया और शिर पर हाथ इसलिए रखा कि सन्तों का दयालु स्वभाव है । माता पुत्र की कल्पना उसमें कुछ न थी । केवल आत्मारूप जगत् उसको भासता था ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने सिद्धदर्शनहेतुकथनन्नाम विंशतितमसर्गः ॥ २० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! फिर वहाँ से देवी और लीला दोनों अन्तर्धान हो गईं । तब वहाँ के लोग कहने लगे कि वनदेवियों ने हमारे ऊपर बड़ी कृपा करके हमारे दुःख नाश किये और अन्तर्धान हो गईं । हे रामजी ! तब दोनों आकाश में आकाशरूप अन्तर्धान हुईं और परस्पर संवाद करने लगीं । जैसे स्वप्न में संवाद होता है वैसे ही उनका परस्पर संवाद हुआ । देवी ने कहा, हे लीले ! जो कुछ जानना था सो तूने जाना और जो कुछ देखना था सो भी देखा—यह सब ब्रह्म की शक्ति है । और जो कुछ पूछना हो सो पूछो । लीला बोली, हे देवि ! मैं अपने भर्त्ता विदूरथ के पास गई तो उसने मुझे क्यों न देखा और मेरी इच्छा से ज्येष्ठशर्मा आदि ने मुझे क्यों देखा इसका कारण कहो ?
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देवी बोली, हे लीले ! तब तेरा द्वैतभ्रम नष्ट न हुआ था और अभ्यास करके अद्वैत को न प्राप्त हुई थी । जैसे धूप में छाया का सुख नहीं अनुभव होता वैसे ही तुझको अद्वैत का अनुभव न था । हे लीले ! जैसे ऋतु का फल मधुर होता है । जैसे ज्येष्ठ आषाढ़ विदित हो और वर्षा नहीं आई वैसे ही तू थी—अर्थात् संसारमार्ग को लांघी थी पर अद्वैत तत्त्व को न प्राप्त हुई थी इससे आत्मशक्ति तुझको न प्रत्यक्ष हुई थी । आगे तेरा सत्संकल्प न था और अब तू सत्संकल्प हुई है । अब मैंने सत्संकल्प किया है कि तुझको ज्येष्ठशर्मा देखे इसी से वे सब तुझको देखते भये । अब तू विदूरथ के निकट जावेगी तो तेरे साथ ऐसा ही व्यवहार होगा । लीला बोली, हे देवि ! इस मण्डप आकाश में मेरा भर्त्ता वशिष्ठ ब्राह्मण हुआ और फिर जब मृतक हुआ तब इसी लोक मण्डप आकाश में उसको पृथ्वी लोक फुरि आया, जिससे पद्म राजा हो उसने चिरकाल पर्यन्त चारों द्वीपों का राज्य किया और जब फिर मृतक हुआ तब इसी मण्डप आकाश में उसको जगत् भासित होकर पृथ्वीपति हुआ उसका नाम विदूरथ हुआ । हे देवि ! इसी मण्डप आकाश में जर्जरीभाव और जन्म मरण हुआ और अनन्त ब्रह्माण्ड इसमें स्थित हैं । जैसे सम्पुट में सरसों के अनेक दाने होते हैं वैसे ही इसमें सब ब्रह्माण्ड मुझको समीप ही भासते हैं और भर्त्ता की सृष्टि भी मुझको अब प्रत्यक्ष भासती है अब जो कुछ तुम आज्ञा करो सो मैं करूँ । देवी बोली, हे भूतल अरुन्धती ! तेरे जन्म तो बहुत हुए हैं और अनेक तेरे भर्त्ता हुए हैं पर उन सबमें यह भर्त्ता इस मण्डप में है । एक वशिष्ठ ब्राह्मण था सो मृतक हो उसका शरीर तो भस्म हो गया है और फिर पद्म राजा हुआ उसका शव तेरे मण्डप में पड़ा है और तीसरा भर्त्ता संसार मण्डप में वसुधापति हुआ वह संसार समुद्र में भोगरूपी कल्लोल कर व्याकुल है । वह राजा में चतुर हुआ है पर आत्मपद से विमुख हुआ है । अज्ञान से जानता था कि मैं राजा हूँ; मेरी आज्ञा सबके ऊपर चलती है और मैं बड़े भोगों का भोगनेवाला और सिद्ध बलवान् हूँ । हे लीले ! वह संकल्प विकल्परूपी रस्सी से बाँधा हुआ है । अब तू किस भर्त्ता के पास
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चलती है। जहाँ तेरी इच्छा हो वहाँ में तुझको ले जाऊँ। जैसे सुगन्ध को वायु ले जाता है वैसे ही मैं तुझको ले जाऊँगी। हे लीले! जिस संसारमण्डल को तू समीप कहती है सो वह चिदाकाश की अपेक्षा से समीप भासता है और सृष्टि की अपेक्षा से अनन्त कोटि योजनों का भेद है। इनका वपु आकाशरूप है। ऐसी अनन्त सृष्टि पड़ी फुरती है। समुद्र और मन्दराचल पर्वत आदिक अनन्त हैं उनके परमाणु में अनन्त सृष्टि चिदाकाश के आश्रय फुरती है। चिद्अणु में रुचि के अनुसार सृष्टि बड़े आरम्भ से दृष्टि आती है और बड़े स्थूल गिरि पृथ्वी दृष्टि आते हैं पर विचारकर तोलिये तो एक चावल के समान भी नहीं होती। हे लीले! नाना प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण पर्वत भी दृष्टि भी आते हैं पर आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में चैतन्य का किञ्चन नाना प्रकार का जगत् दृष्टि आता है वैसे ही यह जगत् चैतन्य का किञ्चन है। पृथ्वी आदि तत्त्वों से कुछ उपजा नहीं। हे लीले! आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है। जैसे नदी में नाना प्रकार के तरङ्ग उपजते हैं और लीन भी होते हैं वैसे ही आत्मा में जगज्जाल उपजा और नष्ट भी हो जाता है, पर आत्मसत्ता इनके उपजने और लीन होने में एक रस है। यह सब केवल आभासरूप है वास्तव कुछ नहीं। लीला बोली हे माता! अब मुझको पूर्व की सब स्मृति हुई है। प्रथम मैंने ब्रह्मा से राजसी जन्म पाया और उससे आदि लेकर नाना प्रकार के जो अष्टशत जन्म पाये हैं वे सब मुझको प्रत्यक्ष भासते हैं। प्रथम जो चिदाकाश से मेरा जन्म हुआ उसमें मैं विद्याधर की स्त्री भई और उस जन्म के कर्म से भूतल में आकर मैं दुःखी हुई। फिर पद्मिनी भई और जाल में फँसी और उसके अनन्तर भीलनी होकर कदम्ब वन में विचरने लगी। फिर वनलता भई; वहाँ गुच्छे मेरे स्तन और पत्र मेरे हाथ थे। जिसकी पर्ण-कुटी में मैं लता थी वह ऋषीश्वर मुझको हाथ से स्पर्श किया करता था इसमें मैं मृतक होकर उसके गृह में पुत्री हुई। वहाँ जो मुझसे कर्म हो सो पुरुष ही का कर्म हो इसमें में बड़ी लक्ष्मी से सम्पन्न राजा हुई। वहाँ मुझसे दुष्टकर्म हुए इससे मैं कुष्ठरोगग्रसित बन्दरी होकर आठ वर्ष वहाँ
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रही। फिर मैं बैल हुई; मुझको किसी दुष्ट ने खेती के हल में जोड़ा और उससे मैंने दुःख पाया। फिर मैं भ्रमरी भई और कमलों पर जाकर सुगन्ध लेती थी। फिर मृगी होकर चिर पर्यन्त वन में विचरी। फिर एक देश का राजा भई और सौ वर्ष पर्यन्त वहाँ सुख भोगे और फिर कछुये का जन्म लेकर, राजहंस का जन्म लिया। इसी प्रकार मैंने अनेक जन्मों को धारण करके बड़े कष्ट पाये। हे देवि! आठसौ जन्म पाकर में संसारसमुद्र में वासना से घटीयन्त्र की नाईं भ्रमी हूँ। अब मैंने निश्चय किया है कि आत्मज्ञान बिना जन्मों का अन्त कदाचित नहीं होता सो तुम्हारी कृपा से अब मैंने निःसंकल्प पद को पाया।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने जन्मान्तरवर्णन- नाम एकविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
इतनी कथा सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन्! वज्रसार की नाइ वह ब्रह्माण्ड खप्पर जिसका अनन्त कोटि योजन पर्यन्त विस्तार था उसे ये दोनों कैसे लंघती गईं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! वज्रसार ब्रह्माण्ड खप्पर कहाँ है और वहाँ तक कौन गया है? न कोई वज्रसार ब्रह्माण्ड है और न कोई लाँघ गया है सब आकाशरूप है। उसी पर्वत के ग्राम में जिसमें वशिष्ठ ब्राह्मण का गृह था उसी मण्डप आकाशरूप सृष्टि का वह अनुभव करता भया। हे रामजी! जब वशिष्ठ ब्राह्मण मृतक भया तब उसी मण्डपाकाश के कोने में अपने को चारों ओर समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राजा जानने लगा कि मैं राजा पद्म हूँ और अरुन्धती को लीला करके देखा कि यह मेरी स्त्री है। फिर वह मृतक हुआ तो उसको उसी आकाशमण्डप में और जगत् का अनुभव हुआ और उसने अपने को राजा विदूरथ जाना। इससे तुम देखो कि कहाँ गया और क्या रूप है? उसी मण्डप आकाश में तो उसको सृष्टि का अनुभव हुआ; इससे जो सृष्टि है वह उसी वशिष्ठ के चित्त में स्थित है। तब ज्ञप्तिरूप देवी की कृपा से अपने ही देहाकाश में लीला आन्तवाहक देह से जो आकाशरूप है उड़ी और ब्रह्माण्ड को लाँघ के फिर उसी गृह में आई। जैसे स्वप्न से स्वप्नान्तर को प्राप्त हो वैसे ही देख आई। पर वह गई कहाँ और आई
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कहाँ ? एक ही स्थान में रहकर एक सृष्टि से अन्य सृष्टि को देखा । इनको ब्रह्माण्ड के लंघ जाने में कुछ यत्न नहीं, क्योंकि उनका शरीर अन्तवाहक रूप है । हे रामजी ! जैसे मन से जहाँ लंघना चाहे वहाँ लंघ जाता है वैसे ही प्रत्यक्ष लंधी है । वह सत्यसंकल्परूप है और वस्तु से कहे तो कुछ नहीं । हे रामजी ! जैसे स्वप्न की सृष्टि नाना प्रकार के व्यवहारों सहित बड़ी गम्भीर भासती है पर आभासमात्र है वैसे ही यह जगत् देखते हैं पर न कोई ब्रह्माण्ड है न कोई जगत् है और न कोई भीत है केवल चैतन्यमात्र का किञ्चन है और बना कुछ नहीं । जैसे चित्तसंवेदन फुरता है वैसे ही आभास हो भासता है । केवल वासनामात्र ही जगत् है, पृथ्वी आदिक भूत कोई उपजा नहीं-निवारण ज्ञान आकाश अनन्तरूप स्थित है । जैसे स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप पवन ही है वैसे ही स्फुर और अस्फुररूप आत्मा ही ज्यों का त्यों है और शान्त सर्वरूप चिदाकाश है । जब चित्त किञ्चन होता है तब आपही जगतरूप हो भासता है-दूसरा कुछ नहीं । जिन पुरुषों ने आत्मा को जाना है उनको जगत् आकाश से भी शून्य भासता है और जिन्होंने नहीं जाना उनको जगत् वज्रसार की नाईं दृढ़ भासता है । जैसे स्वप्न में नगर भासते हैं वैसे ही यह जगत् है । जैसे मरुस्थल में जल और सुवर्ण में भूषण भासते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है । हे रामजी ! इस प्रकार देवी और लीला ने संकल्प से नाना प्रकार के स्थानों को देखा जहाँ झरनों से जल चला आता था, बावली और सुन्दर ताल और बगीचे देखे जहाँ पक्षी शब्द करते थे और मेघ पवन संयुक्त देखे मानों स्वर्ग यहीं था ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने गिरिग्राम-वर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देखके वे दोनों शीतलचित्त ग्राम में वास करती भईं और चिरकाल जो आत्मअभ्यास किया था उससे शुद्ध ज्ञानरूप और त्रिकालज्ञान से सम्पन्न हुईं । उससे उन्हें पूर्व की स्मृति हुई और जो कुछ अरुन्धती के शरीर से किया था सो देवी से
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कहा कि हे देवि ! तुम्हारी कृपा मे अब मुझको पूर्व की स्मृति हुई जो कुछ इस देश में मैंने किया था सो प्रकट भासता है कि यहाँ एक ब्राह्मणी थी, उसका शरीर वृद्ध था और नाड़ियाँ देखती थीं और भर्त्ता को बहुत प्यारी और पुत्रों की माता थी वह में ही हूँ। हे देवि ! मैं यहाँ देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करती थी, यहाँ दूध रखती, यहाँ अन्नादिकों के बासन रखती थी, यहाँ मेरे पुत्र, पुत्रियाँ, दामाद और दौहित्र बैठते थे; यहाँ में बैठती थी और भृत्यों को कहती थी कि शीघ्र ही कार्य करो । हे देवि ! यहाँ में रसोई करती थी और मेरा बर्त्ता शाक और गोबर ले आता था और सर्व मर्यादा कहता था । ये वृक्ष मेरे लगाये हुए हैं, कुछ फल मैंने इनसे लिये हैं और कुछ रहे हैं वे ये हैं । यहाँ में जलपान करती थी । हे देवि ! मेरा बर्त्ता सब कर्मों में शुद्ध था पर आत्मस्वरूप से शून्य था । सब कर्म मुझको स्मरण होते हैं । यहाँ मेरा पुत्र ज्येष्ठशर्मा गृह में रुदन करता है । यह बेलि मेरे गृह में बिस्तरी है और सुन्दर फूल लगे हैं। इनके गुच्छे छत्रों की नाईं हैं और झरोखे बेलि से आवरे हुए हैं । यह मेरा मण्डप आकाश है, इसमें मेरे बर्त्ता का जीव आकाश है । देवी बोली, हे लीले ! इस शरीर के नाभिकमल से दश अंगुल ऊर्ध्व हृदयाकाश है, सो अंगुष्ठ-मात्र हृदय है, उसमें उसका संवित् आकाश है । उसमें जो राजसी वासना थी उससे उसके चारों समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राज्य फुर आया कि "मैं राजा हूँ" यहाँ उसे आठ दिन मृतक हुए बीते हैं और यहाँ चिरकाल राज्य का अनुभव करता है । हे देवि ! इस प्रकार थोड़े काल में बहुत अनुभव होता है और हमारे ही मण्डप में वह सब पड़ा है । उसकी पुर्यष्टक में जगत् फुरता है उसमें ही राजा विदूरथ है इस राज्य के संकल्प से उसकी संवित् इसी मण्डप आकाश में स्थित है। जैसे आकाश में गन्ध को लेके पवन स्थित हो वैसे ही उसकी चेतन संवित् संकल्प को लेकर इसी मण्डपाकाश में स्थित है उसकी संवित् इस मण्डप आकाश में है उस राजा की सृष्टि मुझको कोटि योजन पर्यन्त भासती है । यदि मैं पर्वत और मेघ अनेक योजन पर्यन्त लंघती जाऊँ तब बर्त्ता के निकट प्राप्त होऊँ और चिदाकाश की अपेक्षा से अपने
उत्पत्ति प्रकरण । २०१
पास ही भासती है । अब व्यवहार दृष्टि से वह कोटि योजन पर्यन्त है इससे चलो जहाँ मेरा भर्त्ता राजा विदूरथ है वह स्थान दूर है तो भी निश्चय से समीप है । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर वे दोनों, जैसे खड्ग की धारा श्याम होती है, जैसे विष्णुजी का अङ्ग श्याम है, जैसे काजर श्याम होता और जैसे भ्रमरे की पीठ श्याम होती है वैसे ही श्याम मण्डपाकाश में पखेरू के समान अन्तर्वाहक शरीर से उड़ीं और मेघों और बड़े वायु के स्थान, सूर्य, चन्द्रमा और ब्रह्मलोक पर्यन्त देवताओं के स्थानों को लांघकर इस प्रकार दूर से दूर गईं और शून्य आकाश में ऊर्ध्व जाके ऊर्ध्व को देखती भईं कि सूर्य और चन्द्रमा आदि कोई नहीं भासता । तब लीला ने कहा हे देवि ! इतना सूर्य आदि का प्रकाश था वह कहाँ गया ? यहाँ तो महाअन्धकार है; ऐसा अन्धकार है कि मानों सृष्टि में ग्रहण होता है । देवी बोली, हे लीले ! हम महाआकाश में आई हैं । यहाँ अन्धकार का स्थान है, सूर्य आदि कैसे भासें ? जैसे अन्धकूप में त्रसरेणु नहीं भासते वैसे ही यहाँ सूर्य चन्द्रमा नहीं भासते । हम बहुत ऊर्ध्व को आई हैं । लीला ने पूछा, हे देवि ! बड़ा आश्चर्य है कि हम दूर से दूर आई हैं जहाँ सूर्यादिकों का प्रकाश भी नहीं भासता इससे आगे अब कहाँ जाना है ? देवी बोलीं, हे लीले ! इसके आगे ब्रह्माण्ड कपाट आवेगा । वह बड़ा वज्रसार है और अनन्त कोटि योजन पर्यन्त उसका विस्तार है और उसकी धूलि की कणिका भी इन्द्र के वज्र समान है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवी कहती ही थी कि आगे महावज्रसार ब्रह्माण्ड कपाट आया और अनन्त कोटि योजन पर्यन्त उसका विस्तार देखकर उसको भी वे लाँघ गई पर उन्हें कुछ भी क्लेश न भया क्योंकि जैसा किसी को निश्चय होता है वैसा ही अनुभव होता है । वह निरावरण आकाशरूप देवियाँ ब्रह्माण्ड कपाट को लाँघ गईं । उसके परे दशगुणा जल का आवरण; उसके परे दशगुणा अग्नितत्त्व; उसके परे दशगुणा वायु; उसके परे दशगुणा आकाश और उसके परे परमाकाश है । उसका आदि मध्य और अन्त कोई नहीं । जैसे बन्ध्या के पुत्र की कथा की चेष्टा
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का आदि अन्त कोई नहीं होता वैसे ही परम आकाश है; वह नित्य, शुद्ध और अनन्तरूप है और अपने आपमें स्थित है । उसका अन्त लेने को यदि सदाशिव मनरूपी वेग से और विष्णुजी गरुड़ पर आरूढ़ होके कल्प पर्यन्त धावें तो भी उसका अन्त न पावें और पवन अन्त लिया चाहे तो वह भी न पावे । वह तो आदि, मध्य और अन्त कल्पना से रहित बोधमात्र है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे पुनराकाशवर्णनन्नाम त्रयो- विंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वे पृथ्वी, अप, तेज आदिक आवरणों को लाँघ गईं तब परम आकाश उनको भासित हुआ । उसमें उनको धूलि की कणिका और सूर्य के त्रसरेणु के समान ब्रह्माण्ड भासे । वह महा-शून्य को धारनेवाला परम आकाश है और चिदणु जिसमें सृष्टि फुरती है वह ऐसा महासमुद्र है कि कोई उसमें अधः को जाता है और कोई ऊर्ध्व को जाता है कोई तिर्यक् गति को पाता है । हे रामजी ! चित् संवित् में जैसा जैसा स्पन्द फुरता है वैसा ही वैसा आकार हो भासता है; वास्तव में कोई अधः है, न कोई ऊर्ध्व है, न कोई आता है और न कोई जाता है केवल आत्मसत्ता अपने आप में ज्यों की त्यों स्थित है । फुरने से जगत् भासता है और उत्पन्न होकर फिर नष्ट होता है । जैसे बालक का संकल्प उपज के नष्ट हो जाता है वैसा ही चैतन्य संवित् में जगत् फुरके नष्ट हो जाता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अधः और ऊर्ध्व क्या होते हैं; तिर्यक् क्यों भासते हैं और यहाँ क्या स्थित है सो मुझसे कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! परमाकाश-सत्ता आवरण से रहित शुद्ध बोधरूप है । उसमें जगत् ऐसे भासता है जैसे आकाश में भ्रान्ति से तरुवरे भासते हैं, उसमें अधः और ऊर्ध्व कल्पनामात्र है । जैसे हलों के बेंट के चौगिर्द चीटियाँ फिरती हैं और उनको मन में अधः ऊर्ध्व भासता है सो उनके मन में अधः ऊर्ध्व की कल्पना हुई है । हे रामजी ! यह जगत् आत्मा का आभासरूप है । जैसे मन्दराचल पर्वत के ऊपर हस्तियों के समूह विचरते हैं वैसे ही आत्मा में अनेक जगत्
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चलीं और अन्तवाहक शरीर से आकाशमार्ग को उड़ीं। जाते जाते ब्रह्माण्ड की बाट को लाँघ गईं तब विदूरथ के सङ्कल्प में जगत् को देखा। जैसे तालाब में सेवार होती है वैसे ही उन्होंने जगत् को देखा। सप्तद्वीप, नवखण्ड, सुमेरुपर्वत, द्वीपादिक सब रचना देखी और उसमें जम्बूद्वीप और भरतखण्ड और उसमें विदूरथ राजा का मण्डपस्थान देखती भईं। वहीं उन्होंने राजा सिद्ध को भी देखा कि राजा विदूरथ की पृथ्वी की कुछ हद उसके भाइयों ने दबाई थी और उसके लिये सेना भेजी। राजा विदूरथ ने सुन के सेना भेजी और दोनों सेना मिलके युद्ध करने लगीं। फिर उन्होंने देखा कि त्रिलोकी युद्ध का कौतुक देखने को आई है; देवता विमानों पर आरूढ़ और सिद्ध, चारण, गन्धर्व और विद्याधर शस्त्रों को छोड़ देखने को स्थित भये हैं। विद्याधरी और अपसरा भी आई हैं कि जो शूरमा युद्ध में प्राणों को त्यागेंगे हम उनको स्वर्ग में ले जावेंगी। रक्त और मांस भोजन करने को भूत, राक्षस, पिशाच, योगिनियाँ भी आन स्थित भई हैं। हे रामजी! शूर पुरुष तो स्वर्ग के भूषण हैं और अक्षयस्वर्ग को भोगेंगे और जिनका मरना धर्मपक्ष से संग्राम में होगा वह भी स्वर्ग को जावेंगे। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन्! शूरमा किसको कहते हैं और जो युद्ध करके स्वर्ग को नहीं प्राप्त होते वे कौन हैं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो शास्त्रयुक्ति से युद्ध नहीं करते और अनर्थरूपी अर्थ के निमित्त युद्ध करते हैं सो नरक को प्राप्त होते हैं और जो धर्म, गौ, ब्राह्मण, मित्र, शरणागत और प्रजा के पालन के निमित्त युद्ध करते हैं वे स्वर्ग के भूषण हैं। वे ही शूरमा कहाते हैं और मरके स्वर्ग में जाते हैं और स्वर्ग में उनका यश बहुत होता है। जो पुरुष धर्म के अर्थ युद्ध करते हैं वे अवश्य स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं और जो अधर्म से युद्ध करते हैं वे मृतक हो नरक को प्राप्त होते हैं। हे रामजी! जो पुरुष कहते हैं कि संग्राम में मरे सब स्वर्ग को प्राप्त होते हैं वे मूर्ख हैं। स्वर्ग को वही जाते हैं जिनका मरना धर्म के अर्थ हुआ है जो किसी के भोग के अर्थ युद्ध करते हैं सो नरक को ही प्राप्त होते हैं।
इति श्री यो० लीलो० गगननगरयुद्धवर्णनन्नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥२५॥
उत्पत्ति प्रकरण । २०५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दोनों देवियों ने रणसंग्राम में क्या देखा कि एक महाशून्य वन है उसमें जैसे दो बड़े समुद्र उछलकर परस्पर मिलने लगें वैसे ही दोनों सेना जुड़ी हैं । तब उन्होंने क्या देखा कि सब योद्धा आन स्थित हुए हैं और मच्छव्यूह और गरुड़व्यूह और चक्रव्यूह भिन्न-भिन्न भाग करके दोनों सेना के योद्धा एक-एक होकर युद्ध करने लगे हैं । प्रथम परस्पर देख एक ने कहा कि यह बाण चलाव और दूसरे ने कहा कि नहीं तू चला, उसने कहा नहीं तू ही प्रथम चला । निदान सब स्थिर हो रहे, मानो चित्र लिखे छोड़े हैं । इसके अनन्तर दोनों सेना के और योद्धा आये मानों प्रलयकाल के मेघ उछले हैं उनके आने से एक-एक योद्धा की मर्यादा दूर हो गई तब इकट्ठे युद्ध करने लगे और बड़े शस्त्रों के प्रवाह के प्रहार करने लगे । कहीं खड्गों के प्रहार चलते थे और कहीं कुल्हाड़े, त्रिशूल, भाले, बरछियाँ, कटारी, छुरी, चक्र, गदादिक शस्त्र बड़े शब्द करके चलने लगे । जैसे मेघ वर्षाकाल में वर्षा करते हैं वैसे ही शस्त्रों की वर्षा होने लगी । हे रामजी ! प्रलयकाल के जितने उपद्रव थे सो सब इकट्ठे हुए । योद्धा युद्ध की ओर आये और कायर भाग गये । निदान ऐसा संग्राम हुआ कि अनेकों योद्धाओं के शिर काटे गये और उनके हस्ती घोड़े मृत्यु को प्राप्त हुए । जैसे कमल के फूल काटे जाते हैं वैसे ही उनके शीश काटे जाते थे । तब दोनों सेनाओं के राजा चिन्ता करने लगे कि क्या होगा । हे रामजी ! इस युद्ध में रुधिर की नदियाँ चलीं, उनमें प्राणी बहते जाते थे और बड़े शब्द करते थे जिनके आगे मेघों के शब्द भी तुच्छ भासते थे । हे रामजी ! दोनों देवियाँ संकल्प के विमान कल्प के आकाश में स्थित हुईं तो क्या देखा कि ऐसा युद्ध हुआ है जैसे महाप्रलय में समुद्र एक रूप हो जाते हैं और बिजली की नाईं शस्त्रों का चमत्कार होता था । जो शूरवीर हैं उनके रक्त की जो बूँदियाँ पृथ्वी पर पड़ती हैं उन बूँदों में जितने मृत्तिका के कणके लगे होते हैं उतने ही वर्ष वे स्वर्ग को भोगेंगे । जो शूरमा युद्ध में मृतक होते थे उनको विद्याधारियाँ स्वर्ग को ले जाती थी और देवगण स्तुति करते थे कि ये शूरमा स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं और अक्षय अर्थात्
२०६ योगवाशिष्ठ ।
चिरकाल स्वर्ग भोगेंगे । हे रामजी ! स्वर्गलोक के भोग मन में चिन्तन करके शूरमा हर्षवान् होते थे और युद्ध में नाना प्रकार के शस्त्र चलाते और सहन करते थे और फिर युद्ध के सम्मुख धीरज करके स्थित होते थे । जैसे सुमेरु पर्वत धैर्यवान् और अचल स्थित है उससे भी अधिक वे धैर्य-वान् थे । संग्राम में योद्धा ऐसे चूर्ण होते थे जैसे कोई वस्तु ऊखली में चूर्ण होती है परन्तु फिर सम्मुख होते और बड़े हाहाकार शब्द करते थे । हस्ती से हस्ती परस्पर युद्ध करते शब्द करते थे । हे रामजी ! इसी प्रकार अनेक जीव नाश को प्राप्त हुए । जो शूरमा मरते थे उनको विद्याधरियाँ स्वर्ग को ले जाती थीं । निदान परस्पर बड़े युद्ध हुए । खड्गवाले खड्गवाले से और त्रिशूलवाले त्रिशूलवाले से युद्ध करते । जैसा-जैसा शस्त्र किसी के पास हो वैसे ही उसके साथ युद्ध करें और जब शस्त्र पूर्ण हो जावें तो मुष्टि के साथ युद्ध करें । इसी प्रकार दशों दिशाएँ युद्ध से परिपूर्ण हुईं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे लीलोपाख्याने रणभूमिवर्णन्नाम षड्विंशति-तमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार बड़ा युद्ध हुआ तो गंगाजी के समान शूरमों के रुधिर का तीक्ष्ण प्रवाह चला और उस प्रवाह में हस्ती, घोड़े, मनुष्य, रथ सब बहे जाते थे और सेना नाश को प्राप्त होती जाती थी । हे रामजी ! उस समय बड़ा क्षोभ उदय हुआ और राक्षस, पिशाचादिक तामसी जीव मांस भोजन करते और रुधिर-पान करते, आनन्दित होते थे । जैसे मन्दराचल पर्वत से क्षीरसमुद्र को क्षोभ हुआ था वैसे ही युद्धसंग्राम में योद्धाओं का क्षोभ हुआ और रुधिर का समुद्र चला । उसमें हस्ती, घोड़े, रथ और शूरमा तरङ्गों की नाईं उछलते दृष्टि आते थे । रथवालों से रथवाले घोड़ेवालों से घोड़ेवाले; हस्तीवाले से हस्तीवाले और प्यादे से प्यादे युद्ध करते थे । हे रामजी ! जैसे प्रलयकाल की अग्नि में जीव जलते हैं वैसे ही जो योद्धा रणभूमि में आवें सो नाश को प्राप्त हों । जैसे दीपक में पतङ्ग प्रवेश करता है, और जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं वैसे ही रणभूमि में दशों दिशाओं के योद्धा प्रवेश करते थे । किसी का शीश काटा जावे
उत्पत्ति प्रकरण । २०७
और धड़ युद्ध करें; किसी की भुजा काटी जावें और किसी के ऊपर रथ चले जावें और हस्ती, घोड़े, उलट-उलट पड़ें और नाश हो जावें। हे रामजी ! दोनों राजाओं की सहायता के निमित्त पूर्वदिशा, काशी, मद्रास, भोंला, मालव, मकला, कवटा, किरात, म्लेच्छ, पारसी, काशमीर, तुरक, पंजाब, हिमालय पर्वत, सुमेरुपर्वत इत्यादि के अनेक देशपाल, जिनके बड़े भुजदण्ड, बड़े केश और बड़े भयानक रूप थे युद्ध के निमित्त आये। बड़ी ग्रीवावाले, एकटँगे, एकाचल, एकाक्ष, घोड़े के मुखवाले, श्वान के मुखवाले और सुमेरु और कैलास के राजा और जितने कुछ पृथ्वी के राजा थे सो सब आये। जैसे महाप्रलय के समुद्र उछलते हैं और दिशा स्थान जल से पूर्ण होते हैं वैसे ही सेना से सब स्थान पूर्ण हुए और दोनों ओर से युद्ध करने लगे। चक्रवाले चक्रवाले से और खड्ग, कुल्हाड़े, त्रिशूल, छुरी, कटारी, बरछी, गदा, वाणादिक शस्त्रों से परस्पर युद्ध करने लगे। एक कहे कि प्रथम में जाता हूँ दूसरा कहे कि में प्रथम आता हूँ। हे रामजी ! उस काल में ऐसा युद्ध होने लगा कि कहने में नहीं आता। दौड़ दौड़ के योद्धा रण में जावें और मृत्यु को प्राप्त हों। जैसे अग्नि में घृत की आहुति भस्म होती है वैसे ही रण में योद्धा नाश को प्राप्त होते थे। ऐसा युद्ध हुआ कि रुधिर का समुद्र चला, उसमें हस्ती, घोड़े, रथ और मनुष्य तृणों की नाईं बहते थे और सम्पूर्ण पृथ्वी रक्तमय हो गई। जैसे आँधी से फल, फूल और वृक्ष गिरते हैं वैसे ही पृथ्वी पर कट-कट शब्द करते शिर गिरते थे। हे रामजी ! जो उस काल में युद्ध हुआ वह कहा नहीं जाता। सहस्रमुख शेषनाग भी उस युद्ध के कर्मों को सम्पूर्ण वर्णन न कर सकेंगे तब और कौन कहेगा। मैंने वह संक्षेप से कुछ सुनाया है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे लीलोपाख्याने द्वन्द्वयुद्धवर्णनंनाम सप्तविंशतितमसर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार युद्ध हुआ तो सूर्य अस्त हुआ मानों उसकी किरणें भी शस्त्रों के प्रहार से अस्तता को प्राप्त हुईं। तब विदूरथ ने सेनापति और मन्त्री को बुलाकर कहा कि हे मन्त्रियों !