भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 52 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

( ८ ) ओड्ड्यान¹-जालन्धर-मूलवन्धै रुन्निद्रितायामुरगाङ्गनायाम् । प्रत्यङ्मुखत्वात् प्रविशन् सुषुम्नां गमागमां मुञ्चति गन्धवाहः२ ॥६॥ [ १. उड्डीन० ( पाठ० ) । २. योगचिन्तामणि में यह श्लोक ( उड्डीन- जाल••••प्रत्यग् विमुञ्चन•••• ) नन्दिकेश्वरकृत-तारावली ग्रन्थ के नाम से उद्धृत किया गया है (पृ० १५) । ] अनुवाद—ओड्ड्यान (= उड़्डियान), जालन्धर तथा मूल नामक बन्धों के द्वारा भुजगी ( = सर्पाकृति कुलकुण्डली ) के जागरित होने पर गन्धवाहक अर्थात् वायु प्रत्यङ्मुख (= अधोमुख) होकर सुषुम्ना में प्रविष्ट होता है और गमन-आगमन-क्रिया को छोड़ देता दे (अर्थात् निश्चल हो जाता है) । व्याख्या—वायु की प्रत्यङ्मुखगति को कभी-कभी पराङ्मुख गति भी कहा जाता है ( ज्योत्स्नाटीका ३।३७ ) । मूलाधार को सुषुम्नामुख माना जाता है—सुषुम्नामुखं मूलाधार एवोक्तम ( योगचिन्ता०, पृ० १११ ) । चूंकि कुण्डली, कुण्डलिनी या कुलकुण्डलिनी सर्पाकृतिवाली मानी गई है अतः 'उरग-अङ्गना' ( सर्पस्त्री, सर्पकन्या ) शब्द प्रयुक्त हुआ है । प्राणवायु का अधोमुख गमन ह० यो० प्र० १।४८ में कथित हुआ है । ( पूरितं न्यञ्चन् प्राणम; द्र० टीका ) । इस ग्रन्थ में श्लोकोक्त मत का समर्थन मिलता है । ( ३।७४—प्राण का पश्चिमपथ = सुषुम्ना मार्ग में ले जाना ) । 'वायु का सुषुम्ना में प्रवेश' योगियों का अन्यतम महत्त्वपूर्ण अभ्यास है ( ह० यो० प्र० ४।१९ ) । प्राणवायु उपायविशेष से निश्चल होकर रह सकता है । शारीरकभाष्य में इस विषय में एक मार्मिक वाक्य मिलता है—यथा च लोके प्राणापानादिषु