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योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( १० ) 'सन्तापित चन्द्र' क्या है—यह श्लोक में नहीं कहा गया। चन्द्र या सोम ( शरीरस्थ ) का उल्लेख हठयोग-ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से मिलता है। मुख्य चन्द्र सहस्रारपद्म में स्थित है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र भी चन्द्रस्थिति का उल्लेख मिलता है—तालुमूलस्थ चन्द्र ( ह० यो० प्र० ३।७७; योगबीज ५७-५८ ); नासाग्रस्थ चन्द्र ( घेरण्ड० ५।४३ ), भ्रूमध्यस्थ चन्द्र ( ज्योत्स्नाटीका ४।६४ ); हृदयकमलस्थ चन्द्र ( योगियाज्ञ० ९।३५-३६ )। इन चन्द्रों से भी अमृत का क्षरण होता है ( ये सब गौण चन्द्र हैं )। सुधा अमृत या पीयूष के लिए कहीं कहीं 'सार' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ( ह० यो० प्र० ३।४६ )। यह सुधा अग्नि में गिर कर नष्ट हो जाती है। अभ्यास-विशेष से सुधा का पतन बन्द किया जा सकता है। यह सुधापान वस्तुतः पीना रूप क्रिया ( जो लोक में प्रसिद्ध है ) नहीं है--यह धारणा शेष-साध्य है। यही कारण है कि कहीं कहीं 'ध्यायन् चन्द्रमसम्' कहा गया है। इस अमृत का पान करने से कुछ अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त होती हैं; इसी दृष्टि में 'धन्य' शब्द का प्रयोग किया गया है। उदाहरणार्थ लम्बिकोर्ध्वस्थितचन्द्ररस का पान करने वालों के प्रति तक्षकनाग का विष भी व्यर्थ हो जाता है ( ह० यो० प्र० ३।४५ )। बन्धत्रयाभ्यासविपाकजातां विवर्जितां रेचक-पूरकाभ्याम् । विशोषयन्तीं¹ विषयप्रवाहं विद्यां भजे केवलकुम्भरूपाम् ॥८॥ [ १. विशोधयन्तीं ( पाठ० ) = विषयप्रवाह की शुद्धिकारिणी ] अनुवाद--उपर्युक्त तीन बन्धों के अभ्यास से उत्पन्न होने वाली केवल कुम्भक रूप विद्या का भजन (=ऐकान्तिक अभ्यास ) मैं करता हूँ। यह केवल कुम्भक रूप विद्या रेचक-पूरक से वर्जित है तथा विषय-प्रवाह की शोषणकारिणी है।

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