भारतकोश
योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)

Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary

आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा

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( २९ ) व्याख्या - 'निर्मूलितकर्मजाल' कहने का तात्पर्य है—प्रारब्धकर्म का भी निर्मूल होना। देहारम्भक कर्म का भी नाश योग से होता है, यह ज्योत्स्नाटीका (३।८२) में [ विष्णुधर्मपुराण ( यह अमुद्रित है ) का वाक्य उद्धृत कर ] प्रतिपादित हुआ है। कर्मनाश-सम्बन्धी विशेष विचार के लिए विज्ञानभिक्षुकृत सांख्यसार का प्रथम परिच्छेद द्रष्टव्य है। विश्रान्तिमासाद्य तुरीयतत्त्वे¹ विश्वाद्यवस्था-त्रितयोपरिस्थे² । संविन्मयीं कामपि सर्वकालं निद्रां सखे³ निर्विश निर्विकल्पाम् ॥२६॥ [ १. तुरीयतल्पे (पाठा०) (तल्प = शय्या)। प्रतीत होता है कि 'विश्रान्ति' शब्द को देखकर किसी ने तल्प शब्द का प्रयोग कर दिया है। 'तत्त्व' पाठ ही उचित है, क्योंकि वही 'विश्वाद्यवस्थात्रितयोपरिस्थ' है। २. सर्वकालाम् (पाठा०)। इस पाठ को मानने पर यह 'निद्राम्' का विशेषण होगा ('संविन्मयीम्' की तरह), जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। क्रियाविशेषण के रूप में 'सर्वकालम्'-पाठ अधिक संगत है। ३. भज (पाठा०)। इस पाठ में दो क्रियापद (भज तथा निर्विश) होते हैं, जिनकी कोई सार्थकता नहीं है। इस पाठ में छन्दोदोष भी होता है।] अनुवाद--हे सखा, विश्व आदि तीन अवस्थाओं के अतीत तुरीय तत्त्व में विश्राम लाभ करके (अर्थात् उसमें संस्थित होकर) निर्विकल्प, संविन्मयी एवं अनिर्वचनीय अवस्था रूप निद्रा (अर्थात् योगनिद्रा) के सुख का सदैव अनुभव करो। व्याख्या--आत्मा को तुरीय मानने की परम्परा बहुत प्राचीन है (तुरीय= चतुर्थ)। माण्डूक्य उपनिषद् (३-७) में स्थूल-सूक्ष्म क्रम से आत्मभाव को चार भागों में बाँटा गया है--विश्व (जाग्रत्-अवस्था-सम्बन्धी),

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