भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ६१ लीनं बाह्येन्द्रियागोचरं चिद्रूपमर्थं गमयन्तीति लिङ्गानि । मनोऽहङ्कारबुद्धि- चित्तात्मकानि कामरूपादीनि चित्स्फुरत्ताधारत्वात् पीठानि । एतेष्वन्तःकरण- चतुष्टयरूपेषु तत्तद्वृत्तिचतुष्टयमयानि लिङ्गानि स्वयम्भ्वादीनि वसन्तीत्यर्थः । एतत्सर्वं सौभाग्यसुधोदये प्रपञ्चितम् । यथा— पुनरेव कामपीठे तदग्रकोणस्थिते मनोरूपे । प्रतिफलितं तज्ज्योतिः स्वयम्भुलिङ्गं समीरितं सद्भिः ॥५।६॥ दक्षिणकोणेऽहङ्कृतिरूपे जालन्धरे तु संक्रान्तम् । परधाम बाणलिङ्गं^१ जातं संक्रान्त्युपाधिभेदवशात् ॥५।४॥ मध्यत्रिकोणकोणे वामे श्रीपूर्णपीठमेतस्मिन् । बुद्धिमये परतेजः प्रतिफलितं त्वितरलिङ्गतां यातम् ॥५।२॥ चित्तमये श्रीपीठे ज्योतिर्बिन्दौ^२ यदस्य संक्रान्तम् । प्रतिफलितं परधाम्नः परलिङ्गं तत् प्रकीर्त्यते प्राज्ञैः ॥४।१॥ इति॥४४॥ लीन अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के अविषय चित्स्वरूप अर्थ का बोध कराने वाला तत्त्व यहाँ लिंग नाम से कहा गया है । मन, अहंकार, बुद्धि और चित्त के प्रतिनिधि कामरूप प्रभृति को पीठ इसलिये कहा जाता है कि इन्हीं के सहारे चित् तत्त्व का स्फुरण होता है । इस तरह से इन चार अन्तःकरणों के प्रतिनिधि उक्त चार पीठों में इन अन्तः- करणों की चार वृत्तियों के समान स्वयंभू प्रभृति चार लिंगों की स्थिति मानी जाती है । इस विषय को दीपिकाकार ने अपने दूसरे ग्रन्थ ^१सौभाग्यसुधोदय में समझाया है— उस त्रिकोण के अग्रभाग की सीधी रेखा मनोमय कामरूप पीठ का प्रतिनिधित्व करती है । इस स्थान पर परम प्रकाशमय महाबिन्दु का तेज जब पुनः प्रतिफलित होता है, तो उससे स्वयंभू लिंग का आविर्भाव होता है । त्रिकोण के अहंकारमय दक्षिण कोण में स्थित जालन्धर पीठ में जब यह तेज संक्रान्त होता है, तो वह उपाधि के भेद से भिन्न आकार ग्रहण कर बाण लिंग के नाम से जाना जाता है । इसी मध्यत्रिकोण के बुद्धिमय वाम कोण में स्थित पूर्णगिरि पीठ में जब यह परम प्रकाश प्रतिफलित होता है, तो वह इतर लिंग के रूप में अभिव्यक्त होता है । चित्तमय ओड्याण पीठ की स्थिति त्रिकोण १. लिङ्गाज्जातं-ग. उ. । २. विन्दोस्तदस्य-ग. ने. ज. झ. उ. । १. यह ग्रन्थ भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट भाग (पृ० ३०६-३२१) में प्रकाशित हो चुका है। दीपिका के पूर्व संस्करणों में इस ग्रन्थ का नाम सौभाग्यसुभगोदय दिया गया है। यह ठीक नहीं है। भास्करराय ने ललितासहस्रनाम के अपने सौभाग्य- भास्कर नामक भाष्य (पृ० १००, १२२, १२५), वरिवस्यारहस्य (पृ० ६८) तथा नित्याषोडशिकार्णवटीका सेतुबन्ध (पृ० २९१) में सौभाग्यसुधोदय के नाम से ही इसको उद्धृत किया है। आनन्दवर्द्धन के अनुसार इसका रचनाकाल विक्रम संवत् १६७० (सन् १६१३ ई०) है।