भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

स्रोतःपक्षपातिन्याः सौभाग्यदेवतायाः परायाः परापरशक्तिप्रधानत्वात् स्थितेश्च परापरशक्त्यैधिष्ठितत्वान्मध्यबीजस्य स्थितिरूपत्वात् तत्र विमर्शकरेवस्थान- मुक्तम् । शिवस्य संहाररूपत्वाच्छक्तिबीजस्य च संहारात्मकत्वात् प्रकाशस्य तत्रावस्थानमुक्तं विशेषेण । सामान्यतस्तु वाग्भवे । अत एव तदक्षरद्वयसंबन्धात् तद्विश्व²मयत्वं परायाः कथितमित्याह— चलत्तासंस्थितस्य तु । धर्माधर्मस्य वाच्यस्य विषामृतमयस्य च ॥२३॥ वाचकाक्षरसंयुक्तैः³ कथिता विश्वरूपिणी । तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु मातृकाम् ॥२४॥ गई ? प्रथम बीज में इनका निरूपण क्यों नहीं किया गया ? इसका उत्तर यह है कि परा शक्तिस्वरूपिणी सौभाग्यविद्या की उपासना प्रधान रूप से दक्षिणाम्नाय की पद्धति से होती है। यहाँ परापर शक्ति प्रधान मानी गयी गई है। स्थिति नामक कृत्य को यह परापर शक्ति ही सम्पन्न करती है। मध्य बीज भी स्थिति का प्रतिनिधि माना गया है। इसीलिये सब से पहले यहाँ मध्य बीज में विमर्श शक्ति की, हकार की स्थिति बताई गई है। शिव संहार का अधिष्ठाता है। शक्ति बीज भी संहार का प्रतिनिधि है। अतः संहारात्मक प्रकाश की, प्रकाशात्मक शिव के प्रतिनिधि अनुत्तर अकार की स्थिति संहारात्मक शक्ति बीज में यहाँ बाद में बताई गई है। इस प्रकार अकार और हकार की उक्त विशेष स्थिति द्वितीय तथा तृतीय बीज में ही है। वाग्भव बीज में इनकी स्थिति सामान्य रूप में ही है। अब आगे यह बताया जा रहा है कि इन्हीं दो अक्षरों से संबद्ध होकर यह विश्वोत्तीर्ण परा वाणी विश्वमय हो जाती है, ३६ तत्त्वों वाले विश्व का रूप धारण कर लेती है— स्पन्दावस्था की ओर उन्मुख, विष (संसार) और अमृत (मोक्ष) मय धर्म (शिव) और अधर्म (शक्ति) रूपी वाच्य अर्थ जब वाचक अक्षरों से संवलित हो जाता है, तो यह ¹विश्वोत्तीर्ण महाविद्या विश्वमय हो जाती है। तब तीन-तीन संख्या वाले सभी पदार्थों की समष्टिस्वरूपिणी यह परा मातृका तीन कूटों का १. शक्त्यन्वित-ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपत्वं-क. ख. ने. ज. झ. । ३. संयोगात्- क., संबन्धात्-ङ ।

  1. विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय तत्त्व की चर्चा हम पहले (पृ० १५ की टिप्पणी) कर चुके हैं। यहाँ उसी विषय की स्पष्ट चर्चा हुई है। इससे यह निश्चित हो जाता है कि शाक्त-मत, विशेष कर त्रिपुरादर्शन, तत्त्व को विश्वमयता का ही प्रतिपादक न होकर इस प्रसंग में पूरी तरह से त्रिक मत का अनुसरण करता है।