योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
प्राणादयो हि, (एते तु ? एतास्तु) तेषां प्राणादीनामपि प्राणनात्मिका इत्यर्थः । बीजभूता बिन्दुयुक्तत्वात् । स्वराः षोडश अकारादिविसर्गान्ताः, तदात्मकत्वात् । कलनात् प्रक्रमात् । सबिन्दुकस्वरप्राप्तत्वात् १कलनाद् बीजरूपकाः२ [३स्वस्व- बीजस्वरूपाः । अन्तरङ्गतया षोडशविकाराणां त्वगादिधातुवत् तत्राप्रकटत्वात् तन्मय्यः ।] तन्मया योगिन्यो गुप्ताः ४संव्यवस्थिताः । अन्तरङ्गतया अन्तरङ्गम् अन्तरिन्द्रियं बुद्धिः, तच्चमत्कारमयत्वादेता अप्यन्तरङ्गाः, अत एव गुप्ताः, सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे, योगिन्य इत्यत्र छान्दसत्वाद् द्वितीयार्थे प्रथमा । कामाकर्षणरूपाद्या “कामाकर्षणरूपां च” (१।१५८) इत्यादि चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । सृष्टेः५ प्राधान्यतः सृष्टौ वामचक्रस्यैव प्रधानत्वात्, अस्यैव६ चक्रस्य सृष्टिरूपत्वात् । ७अतस्ता योगिनीर्वमिन पूजयेद् वामावर्तक्रमेण८ पूजयेत् । विकाराः षोडश विलासभूताः । प्राणादि९षोडशवायूनां जगत्प्राणनादिशक्त्यात्मिकाः सबिन्दुषोडशस्वरैराकलिताः प्रत्येकं तन्मयीरन्तरङ्गचिदनुप्रविष्टषोडशविकारतया गुप्ताः कामाकर्षिण्याद्याः कलाः सर्वाशापरिपूरके चक्रे वाममार्गेण पूजयेदित्यर्थः ॥१२६-१२९॥ ही कलाएँ प्राण का संचार करती हैं। बिन्दु से संयुक्त होने से ये बीजात्मक हैं। अकार से विसर्ग पर्यन्त स्वर सोलह हैं। ये सोलह कलाएँ इन स्वरों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। बिन्दु से संयुक्त इन सोलह स्वरों से इनकी पहचान होती है, अतः ये कलारूप योगिनियाँ बीजस्वरूपिणी मानी जाती हैं। ये योगिनियाँ गुप्त रूप से रहती हैं, क्योंकि ये अन्तरङ्ग हैं। बुद्धि भीतर की इन्द्रिय है, उसी के चमत्कार से, अनोखे विस्तार से, इनका निर्माण हुआ है। अतः ये भी अन्तरंग हैं और इसी लिये गुप्त रूप से सर्वाशा- परिपूरक चक्र में रहती हैं। योगिनी शब्द में द्वितीया के अर्थ में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग छान्दस है। चतुःशती शास्त्र (१।१५८-१६१) में इन कामाकर्षिणी आदि सोलह कलाओं (योगिनियों) के नाम बताये गये हैं। सृष्टि में वाम चक्र की प्रधानता रहने से और सर्वाशापरिपूरक के सृष्टि चक्र होने से इन योगिनियों की पूजा भी यहाँ वामावर्त क्रम से ही होनी चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि सोलह विकार परा शक्ति के विलास हैं। प्राण आदि सोलह वायुओं में प्राण का संचार करने वाली शक्तियाँ बिन्दुसंयुक्त सोलह स्वरों से आकलित होती हैं और उसी रूप में परिणत हो जाती हैं। अन्तःकरण में चिच्छक्ति के प्रवेश से प्राण आदि सोलह विकारों की सृष्टि होने से ये गुप्त हैं। इन कामाकर्षिणी आदि गुप्त योगिनियों की पूजा वामावर्त क्रम से सर्वाशापरिपूरक चक्र में की जाती है ॥१२६-१२९॥
१. 'कलनाद्' नास्ति-ख. ज. ड. । २. पगाः-ख. ज. उ. । ३. 'स्वस्व'...'तन्मय्यः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ४. संस्थिताः-ख. ने. ज. झ. । ५. सृष्टिप्रा-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. ततस्ताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. णार्चयेत्- ख. ने. ज. झ. उ. । ९. विदश-ख.