भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ३९ ] द्विविध भासित होते हैं। क्षकार और अन्य आठ वर्गों के साथ मिलकर ये नववर्गात्मक हो जाते हैं। मातृका का रूप धारण करने पर ये पचास प्रकार के हो जाते हैं। इस प्रकार तन्त्रसार में अतिसंक्षेप में बताई गई इस वर्णसृष्टिप्रक्रिया का अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (३।१६७-२१९) में विस्तार से वर्णन किया है। परात्रिंशिका के ६-९ श्लोकों की व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त ने वर्गों से तत्त्वों की उत्पत्ति का संक्षेप में उल्लेख किया है। १वे कहते हैं कि अकार से विसर्ग पर्यन्त शिव तत्त्व की व्याप्ति है। कवर्ग से पांच महाभूत, चवर्ग से पांच तन्मात्रा, टवर्ग से पांच कर्मेन्द्रिय, तवर्ग से पांच ज्ञानेन्द्रिय, पवर्ग से मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति और पुरुष नामक पांच तत्त्व, यकार से वकार पर्यन्त चार वर्णों से मशः राग-नियति, विद्या, कला-काल और माया तत्त्व की सृष्टि होती है। शकार से क्षकार पर्यन्त पांच वर्णों से ब्रह्मपंचक, अर्थात् महामाया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव और शक्ति नामक तत्त्वों की सृष्टि होती है। यह आदि-क्षान्ता वर्णमाला ही सभी मन्त्रों और २विद्याओं की भी जननी है। परापंचाशिका १४-१८ श्लोकों में भी तत्त्वों की वर्णात्मकता का यही क्रम वर्णित है। योगिनीहृदय के चक्रसंकेत में वर्गों अथवा तत्त्वों की चक्रात्मकता और मन्त्रसंकेत में विद्यागत वर्णों की तत्त्वात्मकता प्रतिपादित है। इसी तरह से पूजासंकेत ( ३।११४- १५४) में नौ चक्रों की वैखरीमयता और मध्यमा वाणी रूप भूतलिपिमयता वर्णित है। दीपिकाकार (३।१०८) ने स्पष्ट कहा है कि स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्। उसका जब इन्द्रिय मार्ग से बाहरों अथवा में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो वह संवित् विश्वाकार बन जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं है, किन्तु अपनी संविद्देवी ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण चतुष्टय, अव्यक्त, महत्, अहंकार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तियां, इनके विषय, पुर्यष्टक और सोलह विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर लेती है। इसी का नाम श्रीचक्र है। शिव के अघोर, वामदेव आदि पांच मुखों से पृथिवी आदि पांच तत्त्वों की उत्पत्ति मानी जाती है और इन पांच तत्त्वों को ही प्रधान मान कर अन्य सभी तत्त्वों का इन्हीं में अन्तर्भाव किया जाता है। दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इस विषय का भी १. इस प्रसंग को आचार्य नीलकण्ठ गुरुटू ने परात्रिंशिका के अपने भाषानुवाद की टिप्पणियों (पृ० १५१-१५४) में स्पष्ट किया है। २. परात्रिंशिका के इस वचन से भी स्पष्ट है कि पुरुष और स्त्री देवताओं के मनुओं के लिये मन्त्र और विद्या शब्द का पृथक्-पृथक् प्रयोग होता रहा है।