भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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४२२ योगिनीहृदयपरिशिष्टे कामाकर्षणरूपां च ३१८ नि. षो. १.१५८ | गन्धवती भूमिः १४९ सौ. सु. १.४८ कामेश्वरीमग्रकोणे ३४९ नि. षो. १.१८२ | गमनविसर्गानन्द १४९ सौ. सु. १.४७ कामो देवः स काम्य २९४ सौ. सु. ४.३ | गुणत्रयानुसारेण १८७ स्व. सं. कायति नानानाम १२८ सौ. सु. १.६ | गुदमाकुञ्च्य बहुशः ३४३ अ. व. कारणात्मपरामृष्ट २६८, ३१५, सु. वा २४ | गुदमेढ्रान्तरं देवि ३५ स्व. सं. कार्यदृष्ट्या समा १५७ म. स्व. सं. | गुप्तादितप्तकुसुम २७६ प. क्र. कालरात्रिश्च खातीता २३८ स्व. सं. | गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च २१०, ३७७ स्व. सं. काश्मीरजन्माग्निशिखं २८३ अ. को. २.६.१२४ | गुरुवक्त्रप्रयोगेण १७५ स्व. सं. किञ्चित्कर्तारममुं १४७ सौ. सु. १.३५ | गुरुशिष्यपदे ४ स्व. त. ८.३१ किं प्रमाणैर्वराकैस्तै २०५ प. प. ११ | गुरुशुश्रूषया विद्या १० कुलज्ञानमथो वक्ष्ये २१० स्व. सं. | गुरोराज्ञाप्रभावेण १७७ कुलयोषित् कुलं २०१ नि. षो. ४.१५ | गुहा त्रीणि निहिता १२९ ऋ. १.१६४.४५ कुलं शीलं च ९० कु. त. १३.९० | गृणीते तत्त्व १३६, १७१, १७४, १९७, २२५ अ. व. कूटेषु त्रिषु कार्यं १९५ अ. व. | ग्रन्ध्यग्रस्थस्त्रिशृङ्गं ३६ स्व. सं. कृत्याकृत्येष्ववशं १४८ सौ. सु. १.३९ | घण्टाक्वाण इव १५२, ३६० अ. व. कौलगमादिवक्तासौ ३०५ स्व. सं. | घण्टाधारी च डाणह्निमा २३८ स्व. सं. कौलिकादिषु सिद्धान्त १७३ स्व. भै. | घृणा शङ्का भयं ९० कु. त. १३.९० क्रिया पादगता १८५, १९२ सं. प. | घृतकाठिन्यवच्चक्र ९७ सु. वा. ३६ क्रियेच्छाज्ञानशक्तीनां ३२६ प. प. ३२ | चतुरन्वयात्मनाऽपि १२४ सौ. सु. २.२५ क्लेशावहोऽतिकष्टश्च ८५ ग. स्तो. | चतुरन्वयात्मिकेयं १२१ सौ. सु. २.७ क्षकारः कथितो योऽसौ १९३ सं. प. | चतुराननादिजननी १२० सौ. सु. २.१ क्षमां हंसवतीं चैव २३९ स्व. सं. | चतुर्दशयुतं भद्रे १०९ प. त्रि. ९ क्षोभयेत् स्वर्गभूलोक ३५१ नि. षो. ४.६० | चतुर्दशाङ्गुलादूर्ध्वं ३९ स्व. सं. क्षोभयेद्देवगन्धर्व ३५१ नि. षो. ४.६१ | चतुर्दशारवसुधा ७२ सु. वा. १४ खे निरस्तसकल ८६ चि. स्त. ३८ | चतुर्दशी चौषधात्मा २३८ स्व. सं. गगनमनिलश्च १४९ सौ. सु. १.४६ | चतुर्दिक्षु स्थिता ४७ स्व. सं. गणेशग्रह १८४, २३० नि. षो. १.१ | चतुष्पत्रे च देवेशि २३९ स्व. सं. गन्धः स्याद्गन्धतन्मात्रं १५६ | चत्वारः परतो वर्णाः ३२७ प. प. ३३ चत्वारि वाक्परिमिता १२९ ऋ. १.१६४.४५